ट्रंप बनाम तेहरान: समंदर में भिड़े दो दिग्गज, तेल की आग में झुलसने लगी दुनिया!

समंदर की लहरें आज शांत नहीं हैं, क्योंकि वहां पानी नहीं बल्कि बारूद तैर रहा है! जी हां अमेरिका और ईरान के बीच ठनी महाजंग ने अब वो मोड़ ले लिया है जहां से वापसी का रास्ता सिर्फ तबाही की ओर जाता दिख रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रणभूमि बन चुका है, अमेरिकी नौसेना ने ईरानी जहाज को दबोच लिया है, तो दूसरी तरफ तेहरान के किलर ड्रोन्स अमेरिकी जहाजों को निशाना बना रहे हैं। ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है, ये आपकी जेब पर सीधा हमला है क्योंकि कच्चा तेल अब आग उगल रहा है! व्हाइट हाउस में बैठे डोनाल्ड ट्रंप के माथे पर पसीना है, क्योंकि महंगाई का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है। ऐसे में सवाल है कि क्या ये तीसरे विश्वयुद्ध की दस्तक है या फिर कूटनीति के नाम पर होने वाला सबसे बड़ा खूनी खेल? आइए जानते हैं। 

मिडिल ईस्ट के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी नेवी ने ईरानी झंडे वाले एक विशाल कार्गो जहाज को अपने कब्जे में ले लिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस ऑपरेशन की पुष्टि करते हुए कहा कि यह जहाज अमेरिकी नाकाबंदी को तोड़ने की जुर्रत कर रहा था। लेकिन ईरान ने भी चुप बैठने के बजाय 'ईंट का जवाब पत्थर' से दिया है। ईरान की सरकारी एजेंसी 'तसनीम' के मुताबिक, उनके जांबाज सैनिकों ने ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य बेड़ों पर सुसाइड ड्रोन से भीषण हमला किया है। हालांकि नुकसान की सटीक जानकारी अभी गुप्त रखी गई है, लेकिन इस ड्रोन वॉर ने ये साफ कर दिया है कि ईरान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

वहीं दूसरी तरफ जंग की इन खबरों ने वैश्विक तेल बाजार में मानो बम फोड़ दिया है। कच्चे तेल की कीमतें 6 फीसदी से ज्यादा उछल गई हैं, वहीं WTI क्रूड में भी 7 फीसदी की तूफानी तेजी देखी गई है। होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है, वहां से गुजरने वाले जहाजों की संख्या भले ही 20 के पार पहुंची हो, लेकिन सप्लाई चेन टूटने का डर अब हकीकत में बदल रहा है। वहीं अमेरिका के भीतर राष्ट्रपति ट्रंप के लिए राजनीतिक चुनौतियां पहाड़ जैसी खड़ी हो गई हैं। खुद अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने बम फोड़ते हुए कहा है कि अमेरिका में गैस की कीमतें अगले साल तक 3 डॉलर प्रति गैलन के ऊपर ही टिकी रह सकती हैं। यानी अमेरिकी जनता को फिलहाल महंगाई से कोई राहत नहीं मिलने वाली। 

वहीं दूसरी तरफ नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव सिर पर हैं और रिपब्लिकन पार्टी को डर है कि कहीं तेल की ये आग उनकी सत्ता की कुर्सी को न झुलसा दे। हालांकि वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट गर्मियों में कीमतें गिरने की उम्मीद जता रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि कीमतें फिलहाल 4.05 डॉलर के खतरनाक स्तर पर हैं। हालत इतनी खराब है कि एयरलाइंस ने जेट फ्यूल की कमी की चेतावनी तक दे डाली है। वहीं डिप्लोमेसी के मोर्चे पर भी खबरें अच्छी नहीं हैं। इस्लामाबाद में होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता शुरू होने से पहले ही फुस्स हो गई है। ईरान ने साफ कह दिया है कि वार्ता की खबरें सिर्फ अमेरिकी प्रोपेगेंडा हैं और मौजूदा हालात में बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है। 

इस बीच, कंगाली की कगार पर खड़ा पाकिस्तान एक बार फिर अपनी पुरानी फितरत पर उतर आया है। शहबाज शरीफ की सरकार इस उम्मीद में बैठी है कि अगर वो शांति वार्ता की मेजबानी करते हैं, तो अमेरिका उन्हें इनाम के तौर पर डॉलर की बारिश करेगा। पाकिस्तान फिर से अपनी भौगोलिक स्थिति को सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, जैसे उसने 1980 और 2000 के दशक में किया था। लेकिन ऐसा मानना है कि इस बार उसकी ये किरायेदारी की दुकान चलना मुश्किल है।

देखा जाए तो एक तरफ समंदर में गरजती मिसाइलें और ड्रोन्स हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया के बाजारों में हाहाकार मचाता कच्चा तेल। डोनाल्ड ट्रंप के लिए ये युद्ध सिर्फ सरहद की जंग नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। अगर होर्मुज का रास्ता बंद हुआ, तो पूरी दुनिया के पहिये थम जाएंगे। क्या कूटनीति इस बार बारूद को शांत कर पाएगी या फिर तेहरान और वॉशिंगटन की ये जिद पूरी दुनिया को अंधेरे में धकेल देगी? 

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