चिखलदरा में स्ट्रॉबेरी की नई पहचान
विदर्भ का एकमात्र हिल स्टेशन चिखलदरा अब स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रसिद्ध हो रहा है। यहां के किसान पारंपरिक फसलें जैसे चना और गेहूं छोड़कर नकदी फसल स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी कई गुना बढ़ गई है। ठंडा मौसम और बढ़ता पर्यटन इस बदलाव के मुख्य कारण हैं। इस खेती की शुरुआत का श्रेय मोथा गांव के किसान साधुराम पाटिल को जाता है, जिन्होंने सबसे पहले पारंपरिक खेती छोड़कर स्ट्रॉबेरी का प्रयोग किया। उनका प्रयोग सफल होने पर आसपास के अन्य किसान भी इस फसल की ओर आकर्षित हुए हैं।
किसानों की बढ़ी आमदनी और खेत से सीधी बिक्री
किसान गजानन येवले ने इस साल पहली बार स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की है। पहले वे चना-गेहूं जैसी फसलें उगाते थे, जिनसे अधिक कमाई नहीं होती थी। अब स्ट्रॉबेरी से उन्हें रोजाना 4,000 से 5,000 रुपये तक की आमदनी हो रही है और कभी-कभी यह 7,000 रुपये तक पहुंच जाती है। किसान खेत में ही स्ट्रॉबेरी पैक करके बेचते हैं, जिससे बिचौलियों की जरूरत नहीं पड़ती और पूरा मुनाफा सीधे उन्हें मिलता है।
मौसम और फसल की गुणवत्ता
स्ट्रॉबेरी का सीजन नवंबर-दिसंबर से शुरू होकर मार्च-अप्रैल के पहले सप्ताह तक चलता है। चिखलदरा का तापमान विदर्भ के अन्य इलाकों से कम होता है, जिससे स्ट्रॉबेरी का स्वाद और गुणवत्ता बेहतर रहती है। मार्च-अप्रैल में हल्की गर्मी पड़ने पर इसका खट्टा-मीठा स्वाद और भी बढ़ जाता है, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आता है। कृषि विभाग ने ठंडे मौसम के आधार पर महाबलेश्वर की तरह स्ट्रॉबेरी उगाने का सुझाव दिया था और शुरुआती प्रयोग सफल होने के बाद यह खेती पूरे इलाके में फैल गई।
पर्यटन से मिलने वाला अतिरिक्त लाभ
बढ़ते पर्यटन का सीधा फायदा किसानों को मिल रहा है। पर्यटक खेतों से ताजगी वाली स्ट्रॉबेरी खरीदकर ले जाते हैं। यहां बन रहे बड़े स्काईवॉक प्रोजेक्ट से आने वाले पर्यटकों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है, जिससे किसानों की आमदनी में और इजाफा होगा। ढाई से साढ़े तीन महीने के सीजन में किसान लाखों रुपये कमा रहे हैं। हालांकि, मौसम खराब होने पर नुकसान का खतरा भी रहता है, लेकिन ज्यादातर किसान इस नकदी फसल से बेहद संतुष्ट हैं।


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