जगरनाथ महतो, रामदास सोरेन के बाद अब सुदिव्य सोनू, 3 मंत्रियों की मौत का संयोग
झारखंड की सियासत में शनिवार की रात एक ऐसी खबर आई...जिसने सिर्फ झारखंड मुक्ति मोर्चा को नहीं, बल्कि पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया। जिस नेता को कुछ घंटे पहले तक लोग अपने बीच देख रहे थे...जो सरकार में कई बड़े विभाग संभाल रहे थे...जो छात्रों से लेकर युवाओं तक के मुद्दों पर सरकार की तरफ से बातचीत कर रहे थे...वही नेता अचानक इस दुनिया से चले गए। जी हां...झारखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री और गिरिडीह से लगातार दूसरी बार विधायक बने सुदिव्य कुमार सोनू का निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि शनिवार देर रात गिरिडीह स्थित अपने घर पर उनकी अचानक तबीयत बिगड़ी। उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की...परिवार वाले उन्हें आनन-फानन में अस्पताल लेकर पहुंचे...लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। शुरुआती जानकारी के मुताबिक मौत की वजह हार्ट अटैक बताई जा रही है। और इस मौत के साथ झारखंड की राजनीति में एक बेहद दर्दनाक संयोग ने फिर दस्तक दी है। क्योंकि पिछले करीब साढ़े तीन साल में हेमंत सोरेन सरकार के शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले तीन मंत्रियों का असमय निधन हो चुका है। पहले जगरनाथ महतो...फिर रामदास सोरेन...और अब सुदिव्य कुमार सोनू। लेकिन सुदिव्य कुमार सोनू की कहानी सिर्फ एक मंत्री की कहानी नहीं है। ये कहानी है एक ऐसे नेता की...जिसने करीब तीन दशक तक झामुमो के लिए काम किया...तो चलिए...शुरुआत से समझते हैं सुदिव्य कुमार सोनू की पूरी सियासी कहानी।
आपको बता दें गिरिडीह सीट से लगातार दूसरी बार विधायक बने सुदिव्य सोनू सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के राइट हैंड और संकटमोचक माने जाते थे। सुदिव्य कुमार सोनू की पहचान सिर्फ गिरिडीह के विधायक या झारखंड सरकार के मंत्री के तौर पर नहीं थी। वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के पुराने और समर्पित नेताओं में गिने जाते थे। करीब तीन दशक तक वह पार्टी से जुड़े रहे। बताया जाता है कि 1989 में उन्होंने JMM की प्राथमिक सदस्यता ली। इसके बाद 1992 में वह गिरिडीह नगर JMM के संस्थापक अध्यक्ष बने। यानी राजनीति में उनकी शुरुआत किसी बड़े पद से नहीं...बल्कि संगठन और जमीन से हुई थी। उन्होंने पार्टी के लिए लंबे समय तक काम किया। फिर आया चुनावी राजनीति का दौर। सुदिव्य कुमार सोनू ने 2009 में गिरिडीह विधानसभा सीट से JMM के टिकट पर चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने 2014 में भी चुनाव मैदान में किस्मत आजमाई। इस बार भी जीत उनसे दूर रही और वह दूसरे स्थान पर रहे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। संगठन में सक्रिय रहे...लोगों के बीच काम करते रहे...और आखिरकार 2019 में वह मौका आया जब सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह सदर सीट से पहली बार विधानसभा चुनाव जीत लिया।
पांच साल बाद...2024 में उन्होंने फिर इसी सीट से जीत दर्ज की। और इसके बाद उनका कद सिर्फ गिरिडीह की राजनीति तक सीमित नहीं रहा। 2024 में दूसरी बार विधायक बनने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। और उन्हें एक नहीं...बल्कि कई बेहद महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए। उनके पास नगर विकास एवं आवास...उच्च एवं तकनीकी शिक्षा...पर्यटन...कला एवं संस्कृति...खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग था। यानी शहरों के विकास से लेकर शिक्षा...युवाओं से लेकर खेल...और पर्यटन से लेकर कला-संस्कृति तक...सरकार के कई महत्वपूर्ण हिस्सों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। यही वजह थी कि सरकार में उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। और राजनीतिक गलियारों में उन्हें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाने लगा। ऐसे में सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक यूं चले जाने से राज्य में एक ऐसा अजीब और बेहद दुखद संयोग दोहराया गया है, जिसने हर किसी को सन्न कर दिया है।
वहीं अब आते हैं उस संयोग पर...जिसने सुदिव्य कुमार सोनू की मौत के बाद एक बार फिर पूरे राज्य को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दरअसल, पिछले करीब साढ़े तीन साल में हेमंत सरकार के शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले तीन नेताओं का असमय निधन हुआ है। सबसे पहले...जगरनाथ महतो। डुमरी से लगातार चार बार विधायक रहे जगरनाथ महतो हेमंत सरकार में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्री थे। कोरोना संक्रमण के बाद उनके फेफड़ों में गंभीर समस्या हुई। चेन्नई में लंग ट्रांसप्लांट के बाद लंबे इलाज के दौरान 6 अप्रैल 2023 को उनका निधन हो गया। इसके बाद...रामदास सोरेन। 2024 में हेमंत सोरेन सरकार दोबारा बनी तो घाटशिला से विधायक और वरिष्ठ JMM नेता रामदास सोरेन को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका भी आकस्मिक निधन हो गया। और अब...6 सितंबर 2026। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे सुदिव्य कुमार सोनू भी दुनिया छोड़ गए। तीन मंत्री...साढ़े तीन साल के भीतर...
और तीनों का असमय निधन। झारखंड की राजनीति में ये संयोग बेहद दर्दनाक है।
देखा जाए तो 2024 के चुनाव में प्रचंड जीत के बाद हेमंत सरकार अपने पूरे शबाब पर थी, लेकिन सुदिव्य कुमार सोनू जैसे मजबूत स्तंभ का यूं अचानक गिर जाना पार्टी और सरकार दोनों के लिए किसी संकट से कम नहीं है। सुदिव्य सोनू ने गिरिडीह के जमीनी कार्यकर्ता से उठकर कैबिनेट मंत्री तक का जो सफर तय किया था, उसने उन्हें जनता का पसंदीदा नेता बना दिया था। ऐसे में अब सवाल यह है कि हेमंत सोरेन अपने सबसे करीबी सहयोगी और रणनीतिकार के जाने के बाद पैदा हुए इस भारी राजनीतिक और प्रशासनिक शून्य को कैसे भरेंगे? सुदिव्य सोनू के चले जाने से न सिर्फ गिरिडीह बल्कि पूरे झारखंड की राजनीति में जो सन्नाटा पसरा है, उसकी गूंज सालों-साल सुनाई देती रहेगी।
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