त्योहारों से पहले महंगी हुई चीनी! 65 रुपये किलो के पार पहुंचा भाव, मिठाई भी होगी महंगी
त्योहारों का मौसम करीब है...घरों में मिठाइयों की तैयारी हो रही है, चाय की चुस्कियां पहले जैसी ही हैं और बाजार में मिठास की मांग भी बढ़ रही है...लेकिन इसी बीच आम आदमी की रसोई से ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने चाय से लेकर मिठाई तक का स्वाद फीका कर दिया है। जी हां चीनी की कीमतों में ऐसा उछाल आया है कि कई बाजारों में एक किलो चीनी का भाव 65 रुपये के पार पहुंच गया है। यानी जिस चीनी के दाम कुछ समय पहले 42 से 45 रुपये किलो के आसपास थे, वही अब 60 से 65 रुपये किलो तक पहुंच चुकी है। और मामला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका से लेकर ब्राजील और एशिया तक चीनी की कीमतें चढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 30 जून 2026 को चीनी का भाव करीब 474 डॉलर प्रति टन था, जो 20 अगस्त तक बढ़कर करीब 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गया। यानी दो महीने से भी कम वक्त में कीमत में 16 फीसदी से ज्यादा का उछाल और अमेरिका के वायदा बाजार में कच्ची चीनी महीनेभर में करीब 19 फीसदी महंगी हो चुकी है। वहीं अब सवाल बड़ा है कि आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हो रही है? क्या देश में चीनी की कमी हो गई है? क्या गन्ने को एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने से चीनी का उत्पादन घटा है? क्या खराब मौसम और फसल की बीमारियां इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हैं? और सबसे बड़ा सवाल...त्योहारों से पहले बढ़ी चीनी की कीमत का असर आपकी चाय, मिठाई और रोजमर्रा के दूसरे सामानों पर कितना पड़ेगा? आइए जानते हैं।
दरअसल, चीनी की बढ़ती कीमत अब सिर्फ रसोई का मुद्दा नहीं रह गई है। यह देश की अर्थव्यवस्था, किसानों, चीनी मिलों, एथेनॉल नीति और आने वाले त्योहारों से सीधे जुड़ा मामला बन चुकी है। भारत में इस महीने की शुरुआत में दिल्ली में चीनी करीब 52 रुपये किलो मिल रही थी, लेकिन अब कई बाजारों में इसका खुदरा भाव 65 रुपये किलो या उससे भी ज्यादा पहुंच गया है। करीब डेढ़ महीने पहले जहां थोक बाजार में चीनी 42 से 45 रुपये किलो के आसपास थी, वहीं अब थोक भाव भी करीब 62 रुपये किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। वहीं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई को 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 21 अगस्त को बढ़कर 58.20 रुपये प्रति किलो हो गई। यानी राष्ट्रीय औसत में भी कुछ ही हफ्तों में बड़ा उछाल देखने को मिला है। वहीं कुछ राज्यों और स्थानीय बाजारों में भाव 62 से 65 रुपये किलो तक पहुंच चुका है। हरियाणा के कई बाजारों में भी चीनी के दाम 62 से 65 रुपये प्रति किलो के आसपास बताए जा रहे हैं।
वहीं अब जरा नजर डालते हैं इस महंगाई की सबसे बड़ी वजहों पर। सबसे पहले बात मौसम की करते है। आपको बता दें मौसम का बदला मिजाज गन्ने की फसल पर भारी पड़ा है। सक्रिय अल नीनो की परिस्थितियों ने दुनिया के कई बड़े चीनी उत्पादक देशों में मौसम को प्रभावित किया है। ब्राजील के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में बारिश में देरी और बढ़ते तापमान ने गन्ने की फसल पर असर डाला है। थाईलैंड भी इससे अछूता नहीं है। दुनिया के करीब 6 फीसदी गन्ने का उत्पादन करने वाले थाईलैंड में सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। यूरोपीय संघ के चीनी उत्पादक इलाकों में भी प्रतिकूल मौसम ने उत्पादन पर दबाव बढ़ाया है। और भारत में समस्या सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। यहां गन्ने की फसल लाल सड़न यानी रेड रॉट और तना छेदक जैसी बीमारियों की चपेट में आई है। कई इलाकों में असमय भारी बारिश और जलभराव ने भी फसल को नुकसान पहुंचाया है। यानी दुनिया के कई बड़े चीनी उत्पादक देशों में एक साथ उत्पादन घटने की आशंका ने वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर डर पैदा कर दिया है। लेकिन इस पूरी कहानी में एक और बड़ा खिलाड़ी है.....ब्राजील। जी हां ब्राजील अकेले दुनिया के करीब 24 फीसदी गन्ने का उत्पादन करता है। इसलिए वहां गन्ने से जुड़ा कोई भी बड़ा फैसला सीधे पूरी दुनिया के चीनी बाजार को प्रभावित करता है। साथ ही कच्चे तेल की ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच ब्राजील ने गन्ने को चीनी की जगह एथेनॉल उत्पादन की तरफ ज्यादा मोड़ दिया है। ब्राजील सरकार ने अनिवार्य एथेनॉल मिश्रण की दर बढ़ाकर 32 फीसदी कर दी है, जो एक साल पहले 27 फीसदी थी। यानी पेट्रोल में ज्यादा एथेनॉल मिलाने के लिए गन्ने की ज्यादा मात्रा एथेनॉल की तरफ जा रही है और बाजार में चीनी के लिए उपलब्ध गन्ने पर दबाव बढ़ रहा है।
आपको बता दें बाजार विश्लेषकों को आशंका है कि 2026-27 के सीजन में वैश्विक स्तर पर चीनी की सप्लाई तंग रह सकती है। इतना ही नहीं, अगर 2027-28 में गन्ने और चुकंदर की खेती का रकबा घटता है, तो आने वाले समय में यह संकट और गंभीर हो सकता है। वहीं अब आते हैं भारत पर। भारत दुनिया के करीब 16 फीसदी गन्ने का उत्पादन करता है। लेकिन इस सीजन में देश का चीनी उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन यानी 306 LMT रहने का अनुमान है। जबकि शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख मीट्रिक टन का था। यानी शुरुआती अनुमान के मुकाबले उत्पादन में करीब 37 लाख मीट्रिक टन की कमी का अनुमान सामने आ रहा है। वहीं दूसरी तरफ चीनी की महंगाई को लेकर देश में सियासी घमासान भी तेज है।
विपक्ष का आरोप है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के कारण गन्ने का ज्यादा इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में हो रहा है। इससे चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ और बाजार में सप्लाई कम हुई, जिसका सीधा बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ा। लेकिन चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इस दलील को पूरी तस्वीर नहीं मानते। उनका कहना है कि चीनी महंगी होने के पीछे सिर्फ एथेनॉल नहीं, बल्कि कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। जैसे गन्ने का घटता रकबा, कम उत्पादन, छोटा होता पेराई सत्र, फसल में बीमारी, खराब मौसम, बढ़ती मांग, जमाखोरी और निर्यात इन सभी का असर बाजार पर पड़ सकता है।
यानी चीनी की कीमत बढ़ने की कहानी सिर्फ एथेनॉल की नहीं है, बल्कि इसके पीछे खेती से लेकर वैश्विक बाजार तक कई कड़ियां जुड़ी हुई हैं।
हालांकि सरकार का कहना है कि उपलब्ध स्टॉक बाजार में पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। वहीं बाजार में बढ़ती मांग, उत्पादन में कमी और सप्लाई को लेकर आशंकाएं कीमतों को ऊपर धकेल रही हैं। त्योहारों का मौसम भी सामने है। ऐसे में मांग और बढ़ सकती है। और अगर चीनी के दाम इसी तरह ऊपर जाते रहे तो इसका असर सिर्फ आपकी चाय में डाली जाने वाली एक चम्मच चीनी तक सीमित नहीं रहेगा। चीनी महंगी होगी तो सबसे पहले असर चाय और मिठाई पर दिख सकता है।
मिठाई कारोबारियों की भी चिंता बढ़ी हुई है। उनका कहना है कि सिर्फ चीनी ही नहीं, बल्कि आटा, वनस्पति घी और देसी घी जैसी दूसरी चीजों की लागत भी बढ़ी है। ऐसे में मिठाई के दाम में करीब 20 से 30 रुपये प्रति किलो तक बढ़ोतरी करने पर विचार किया जा रहा है। यानी त्योहारों में अगर मिठाई का डिब्बा खरीदने जा रहे हैं तो जेब पहले से ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है।
तो कुल मिलाकर चीनी की कहानी इस वक्त सिर्फ महंगाई की कहानी नहीं है...यह मौसम, बीमारी, गन्ने की खेती, ब्राजील की एथेनॉल नीति, भारत की चीनी नीति, वैश्विक सप्लाई और त्योहारों की बढ़ती मांग इन सभी का मिला-जुला असर है। विपक्ष एथेनॉल नीति को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि चीनी की कोई कमी नहीं है और कीमत बढ़ने की मुख्य वजह रेड रॉट बीमारी, उत्पादन में गिरावट और बढ़ी हुई मांग जैसे कारण हैं। लेकिन आम आदमी के लिए सवाल बहुत सीधा है कि चीनी कब सस्ती होगी? क्योंकि त्योहारों का मौसम सामने है...मिठाई बननी है...चाय बननी है...घरों में पकवान बनने हैं...और अगर चीनी की कीमत इसी तरह चढ़ती रही, तो त्योहारों की मिठास का सबसे बड़ा बिल आखिरकार आम आदमी की जेब को ही चुकाना पड़ेगा। फिलहाल निगाहें बाजार पर हैं, सरकार के अगले कदम पर हैं और इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में चीनी की कीमतें और ऊपर जाती हैं या सरकार के कदमों से आम उपभोक्ता को कुछ राहत मिलती है।
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