सुगाथकुमारी: संवेदना और सामाजिक चेतना की कवयित्री
केरल की धरती ने जिन साहित्यकारों को जन्म दिया, उनमें सुगाथकुमारी का नाम संवेदना, साहस और सृजनात्मक ईमानदारी का पर्याय है। उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना केवल एक कवयित्री को याद करना नहीं, बल्कि उस चेतना को नमन करना है जिसने साहित्य को प्रकृति, नारी और मानवीय करुणा से जोड़ा।
सुगाथकुमारी मलयालम साहित्य की ऐसी सशक्त आवाज़ थीं, जिनकी कविता में सौंदर्य के साथ-साथ प्रतिरोध भी था। उनकी रचनाएँ कोमल भावनाओं से शुरू होकर सामाजिक अन्याय, पर्यावरण विनाश और स्त्री अस्मिता जैसे मुद्दों पर निर्भीक प्रश्न उठाती हैं। वे मानती थीं कि कविता केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, बल्कि समय के प्रति उत्तरदायित्व भी है।
उनकी प्रसिद्ध कविता “मरथिन्टे विलापम्” (पेड़ का विलाप) पर्यावरण साहित्य का मील का पत्थर मानी जाती है। इस कविता ने केरल ही नहीं, पूरे देश में प्रकृति संरक्षण को लेकर चेतना जगाई। साहित्य उनके लिए जीवन से अलग नहीं था—यही कारण है कि वे लेखन के साथ-साथ सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहीं। ‘प्रकृति संरक्षण समिति’ से लेकर अनाथ और पीड़ित महिलाओं के लिए किए गए उनके प्रयास, उनके मानवीय सरोकारों का प्रमाण हैं।
सुगाथकुमारी की भाषा सरल, संप्रेषणीय और भावपूर्ण थी। वे जटिल शिल्प से अधिक सत्य और संवेदना को महत्व देती थीं। उनकी कविताओं में स्त्री की पीड़ा भी है और उसकी शक्ति भी—एक ऐसी स्त्री जो चुप नहीं रहती, बल्कि समय से संवाद करती है।
जयंती के इस अवसर पर सुगाथकुमारी हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना है। उनकी कविताएँ आज भी हमें प्रकृति से प्रेम करने, अन्याय के विरुद्ध बोलने और मनुष्यता को बचाए रखने की प्रेरणा देती हैं।

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