अखंडनगर में झोलाछाप डॉक्टरों का जाल: वर्षों से चल रहा ‘इलाज’ का खेल, स्वास्थ्य विभाग पर उठे गंभीर सवाल
सुल्तानपुर : अखंडनगर विकासखंड के गांवों और कस्बाई बाजारों में बिना डिग्री, बिना पंजीकरण और बिना किसी वैधानिक अनुमति के झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क वर्षों से सक्रिय है। ग्रामीणों की सेहत के साथ खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे बेखौफ तरीके से संचालित हो रहा है।
क्लिनिक नहीं, ‘कानूनी अंधेरे’ के अड्डे
गांवों की तंग गलियों और बाजारों में संचालित इन तथाकथित क्लिनिकों पर न तो पंजीकरण संख्या प्रदर्शित है और न ही चिकित्सकों की शैक्षणिक योग्यता का कोई प्रमाण। इसके बावजूद यहां बुखार, खांसी, पेट दर्द से लेकर गंभीर बीमारियों तक का इलाज किया जा रहा है। इंजेक्शन, ड्रिप और एंटीबायोटिक दवाओं का खुलेआम इस्तेमाल हो रहा है, जिससे मरीजों की सेहत पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
निराला नगर में वर्षों से ‘झोलाछाप राज’
निराला नगर क्षेत्र में झोलाछाप प्रैक्टिस का जाल सबसे अधिक फैला हुआ बताया जा रहा है। यहां डॉ. सूर्यमणि और डॉ. मोनू पिछले दो वर्षों से प्रैक्टिस कर रहे हैं, जबकि डॉ. राजेश कुमार करीब पांच वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दो तिलकधारी व्यक्ति पिछले 34 वर्षों से लगातार चिकित्सा कार्य कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त डॉ. शैलेंद्र कुमार यादव का नाम भी सक्रिय चिकित्सकों में शामिल बताया जा रहा है। सवाल उठता है कि इतने लंबे समय से यह सब आखिर कैसे चलता रहा?
वनबहा सिरखीनपुर बना दूसरा गढ़
वनबहा सिरखीनपुर क्षेत्र भी झोलाछाप डॉक्टरों का सुरक्षित ठिकाना बना हुआ है। यहां डॉ. पन्नालाल राजभर आठ वर्षों से प्रैक्टिस कर रहे हैं, जबकि डॉ. विष्णु राजभर पिछले पांच वर्षों से मरीज देख रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां इलाज अनुभव और अनुमान के आधार पर होता है। न कोई लिखित पर्ची दी जाती है और न ही मरीजों का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है।
मजबूरी का फायदा, सेहत से समझौता
ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की दूरी, संसाधनों की कमी और समय पर डॉक्टर न मिलने की समस्या के चलते लोग मजबूरी में इन झोलाछाप डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं। सस्ता और तुरंत इलाज मिलने का भरोसा देकर ये लोग ग्रामीणों का विश्वास जीत लेते हैं, लेकिन कई बार गलत दवा और गलत उपचार मरीजों की हालत को और गंभीर बना देता है।
स्वास्थ्य विभाग मौन – लापरवाही या मिलीभगत?
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की भूमिका को लेकर उठ रहा है। जब ये क्लिनिक वर्षों से खुलेआम संचालित हो रहे हैं, तो क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई से परहेज किया गया?
यदि भविष्य में कोई बड़ी अनहोनी होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
जांच की मांग, कार्रवाई जरूरी
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि अखंडनगर विकासखंड में संचालित सभी निजी क्लिनिकों की तत्काल जांच कराई जाए। वैध डिग्री और पंजीकरण के बिना चिकित्सा कार्य कर रहे लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि ग्रामीणों की जान से हो रहा यह खतरनाक खेल बंद हो सके।
अब सवाल केवल इलाज का नहीं, बल्कि प्रशासन की नीयत, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है
संवाददाता : दिनेश सिंह अग्निवंशी


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