दहेज और पुत्री जन्म विवाद: बेटी पढ़ाओ–बेटी बचाओ के बावजूद पति ने रची दूसरी शादी,पीड़िता ने एसपी से मांगी न्याय की गुहार
सुलतानपुर : सुलतानपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है जो समाज में बेटियों के प्रति भेदभाव और दहेज प्रथा की कड़वी हकीकत को उजागर करता है। जहां केंद्र और राज्य सरकार “बेटी पढ़ाओ–बेटी बचाओ” अभियान के माध्यम से बेटियों के सम्मान, सुरक्षा और शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, वहीं जनपद में एक महिला ने अपनी आपबीती के जरिए समाज की संकीर्ण सोच और दहेज प्रथा की जड़ें उजागर की हैं।
थाना कोतवाली नगर क्षेत्र के राहुल चौराहा निवासी शबीना बानो ने पुलिस अधीक्षक श्रीमती चारू निगम के कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगाई। पीड़िता ने बताया कि उनका विवाह वर्ष 2015 में फैसल सिद्दीकी (रेती चौकी, जनपद गोरखपुर) से हुआ था। विवाह के कुछ ही समय बाद पति और ससुराल पक्ष द्वारा अतिरिक्त दहेज की मांग शुरू हो गई। पीड़िता के अनुसार, उसे लगातार मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा।
वर्ष 2016 में शबीना बानो ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री के जन्म के बाद पति का व्यवहार और कठोर हो गया। पीड़िता ने आरोप लगाया कि पति ने कहा, “हमें बेटी नहीं चाहिए, हमें बेटा चाहिए”, और इसी कारण वह उसे घर में रखने से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला को अपने मायके, सुलतानपुर में रहने को मजबूर होना पड़ा। पीड़िता का यह भी आरोप है कि उसके पति ने बिना विधिक तलाक की प्रक्रिया पूरी किए दूसरी शादी कर ली।
अपनी नाबालिग पुत्री के भरण–पोषण और न्याय के लिए शबीना बानो ने प्रधान न्यायाधीश, कुटुम्ब न्यायालय सुलतानपुर में वाद दायर किया। न्यायालय ने आरोपी पति के खिलाफ ₹3,65,000 की बकाया भरण–पोषण राशि जमा करने का आदेश पारित किया और आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए वारंट भी जारी किए। बावजूद इसके, पीड़िता का कहना है कि अब तक न तो धनराशि जमा की गई और न ही आदेश का पालन हुआ।
पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक चारू निगम से मिलकर न्यायालय के आदेश का पालन कराने और आरोपी के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की। एसपी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और प्रशासन इस दिशा में हर संभव कदम उठाएगा।
यह मामला एक बार फिर दहेज प्रथा, पुत्र-पुत्री में भेदभाव और बेटियों के प्रति समाज की पूर्वाग्रहपूर्ण मानसिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जबकि सरकार और प्रशासन बेटियों को समान अधिकार, सुरक्षा और शिक्षा देने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं, ऐसे मामले यह दिखाते हैं कि समाज में सोच में बदलाव अभी भी आवश्यक है।
विशेष रूप से यह घटना यह भी बताती है कि “बेटी पढ़ाओ–बेटी बचाओ” का संदेश केवल नारे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए कठोर सामाजिक और कानूनी कदम उठाना अनिवार्य है। दहेज और पुत्र-पुत्री के आधार पर भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई ही बेटियों के अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासनिक स्तर पर पीड़िता को न्याय कब तक मिलेगा और कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं ताकि समाज में बेटियों के प्रति समान सम्मान सुनिश्चित किया जा सके।
संवाददाता : दिनेश सिंह अग्निवंशी


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