वन विभाग की घोर लापरवाही! उमस भरी गर्मी में सड़क किनारे तड़पता रहा बंदर

दोस्तपुर : दोस्तपुर कस्बे के नई बाजार स्थित गांधी आश्रम के पास शनिवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने वन विभाग की कार्यशैली, संवेदनहीनता और जमीनी तैयारियों की पोल खोलकर रख दी। भीषण उमस और गर्मी के बीच एक बंदर अचेत अवस्था में सड़क किनारे पड़ा तड़पता रहा, लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई जिम्मेदार विभाग समय पर मौके पर नहीं पहुंचा। बेजुबान वन्यजीव की बिगड़ती हालत को देखकर स्थानीय लोगों में बेचैनी और आक्रोश दोनों देखने को मिला। लोगों का कहना है कि सूचना दिए जाने के बावजूद वन विभाग की टीम समय पर नहीं पहुंची, और जब पहुंची भी तो हालात संभालने के लिए उसके पास न पर्याप्त संसाधन थे और न ही कोई प्रभावी व्यवस्था। इस पूरी घटना ने वन विभाग की लापरवाही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार नई बाजार स्थित गांधी आश्रम के पास बंदर काफी देर से अचेत अवस्था में पड़ा हुआ था। उमस भरी गर्मी और सड़क किनारे खुले माहौल में पड़े रहने के कारण उसकी हालत लगातार खराब होती जा रही थी। स्थानीय लोग बंदर की हालत देखकर परेशान थे और उसे बचाने के लिए इधर-उधर फोन मिलाते रहे, लेकिन मदद समय पर नहीं पहुंची। बताया जा रहा है कि वन विभाग को इस संबंध में सूचना दी गई थी, इसके बावजूद विभाग की ओर से तत्काल कोई राहत नहीं मिली। लोगों का आरोप है कि वन्यजीवों की सुरक्षा का दावा करने वाला विभाग मौके पर उतनी तत्परता नहीं दिखा पाया, जितनी एक आपात स्थिति में अपेक्षित थी।
जब स्थानीय स्तर पर संपर्क के प्रयास बेअसर रहे और जिम्मेदार लोगों का फोन तक नहीं उठा, तब मामला सुल्तानपुर जिलाधिकारी इंद्रजीत सिंह तक पहुंचाया गया। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत वन विभाग को फोन कर कार्रवाई के निर्देश दिए। डीएम के हस्तक्षेप के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन वहां जो तस्वीर सामने आई, उसने लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मौके पर पहुंचे कर्मचारियों के पास बंदर को सुरक्षित पकड़ने, संभालने और तत्काल राहत देने के लिए जरूरी उपकरणों का अभाव था। यानी जिस विभाग पर वन्यजीवों को बचाने की जिम्मेदारी है, वही विभाग बिना पर्याप्त तैयारी के मौके पर पहुंचा।
मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि वन विभाग की टीम बंदर को पकड़ने और हटाने में भी असहज नजर आई। ऐसे समय में दोस्तपुर कस्बे के व्यापारी सचिन बरनवाल स्थानीय लोगों के साथ मौके पर मौजूद रहे और पूरे घटनाक्रम के दौरान सक्रिय भूमिका निभाते दिखाई दिए। उन्होंने वन विभाग की टीम के साथ रहकर बंदर को सुरक्षित निकालने और इलाज तक पहुंचाने में सहयोग किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कस्बे के लोग और व्यापारी आगे न आते, तो बंदर को समय पर राहत मिलना मुश्किल हो सकता था। इससे यह भी सवाल उठता है कि जब विभागीय अमला मौके पर मौजूद था, तब भी स्थानीय लोगों को आगे बढ़कर जिम्मेदारी क्यों निभानी पड़ी?
बाद में अचेत बंदर को दोस्तपुर पशु चिकित्सा केंद्र लाया गया, जहां उसका उपचार कराया गया। इलाज के बाद वन विभाग की टीम उसे अपने साथ लेकर चली गई। लेकिन पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल छोड़ दिए। पहला सवाल यह कि जब बंदर की सूचना पहले ही दे दी गई थी, तो उसे सड़क किनारे घंटों तक तड़पने के लिए क्यों छोड़ दिया गया? दूसरा, अगर वन विभाग मौके पर पहुंचा भी, तो उसके पास रेस्क्यू के लिए जरूरी सामान और तैयारी क्यों नहीं थी? और तीसरा, क्या वन्यजीवों के रेस्क्यू और उपचार को लेकर विभाग के पास कोई ठोस आपातकालीन तंत्र है भी या नहीं?
दोस्तपुर की यह घटना महज एक बंदर के बीमार पड़ने की खबर नहीं है, बल्कि यह उस सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर है, जो कागजों में तो वन्यजीव संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन जमीनी हकीकत में एक अचेत बंदर को समय पर राहत तक नहीं दे पाता। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिलाधिकारी का हस्तक्षेप न होता, तो शायद वन विभाग की सक्रियता और भी देर से दिखाई देती। लोगों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच कर वन विभाग की जिम्मेदारी तय की जाए, और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी वन्यजीव के साथ ऐसी लापरवाही न हो।
नई बाजार की इस घटना ने वन विभाग की आपातकालीन तैयारियों, संसाधनों की उपलब्धता और फील्ड स्तर की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब एक बेजुबान जानवर सड़क किनारे अचेत पड़ा रहा और उसे बचाने के लिए स्थानीय लोग, व्यापारी और प्रशासनिक हस्तक्षेप तक की जरूरत पड़ गई, तब यह साफ हो जाता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं बड़ी कमी है। लोगों ने मांग की है कि वन विभाग ऐसे मामलों के लिए तत्काल रेस्क्यू टीम, जरूरी उपकरण, वाहन और पशु चिकित्सा समन्वय की मजबूत व्यवस्था करे, ताकि भविष्य में किसी बेजुबान वन्यजीव को सड़क किनारे तड़पते हुए अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष न करना पड़े।
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रिपोर्टर : दिनेश सिंह अग्निवंशी

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