मिट्टी के दीये और कुल्हड़ बनाकर परिवार का पालन-पोषण कर रहे प्रजापति समाज के मेहनतकश कारीगर
भदिला - सुल्तानपुर दीपावली का पावन पर्व नजदीक आते ही गांवों और कस्बों में त्योहार की तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी बीच ग्राम भदिला में प्रजापति समाज के एक मेहनतकश कारीगर अपने हाथों से मिट्टी के दीये और कुल्हड़ तैयार करने में जुटे हैं। उनके लिए दीपावली केवल रोशनी और खुशियों का त्योहार नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की उम्मीदों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। मिट्टी से दीये और कुल्हड़ बनाना आसान काम नहीं है। इसके लिए कारीगर को मिट्टी तैयार करने से लेकर उसे आकार देने, सुखाने और बिक्री के लिए तैयार करने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है। दिनभर की मेहनत के बाद तैयार होने वाले मिट्टी के बर्तन ही उनके परिवार की रोजी-रोटी का मुख्य सहारा हैं। इसी पारंपरिक हुनर के बल पर वह अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सहित घर की अन्य जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते हैं।
बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार के खर्च तक की जिम्मेदारी
इस मेहनतकश प्रजापति कारीगर के लिए मिट्टी के दीये और कुल्हड़ बनाना महज एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है। इसी काम से होने वाली आमदनी से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, घर का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार अपने बच्चों को शिक्षित कर बेहतर भविष्य देने की उम्मीद के साथ लगातार मेहनत कर रहा है। दीपावली के दिनों में कुम्हारों और प्रजापति समाज के पारंपरिक कारीगरों की मेहनत बढ़ जाती है। त्योहार पर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने की उम्मीद में वे पहले से ही तैयारियों में जुट जाते हैं। उनके लिए हर दीया केवल मिट्टी से बना एक सामान नहीं, बल्कि परिवार की उम्मीदों और मेहनत का प्रतीक होता है।
आधुनिकता के दौर में मिट्टी के दीयों का महत्व
आज बाजार में बिजली की झालरों, रंग-बिरंगी लाइटों और आधुनिक सजावटी सामान की भरमार है। इसके बावजूद मिट्टी के दीयों का धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व आज भी कायम है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाना भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। ऐसे में स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदना उनकी मेहनत को सम्मान देने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है। जब लोग बाजार से मिट्टी के दीये और कुल्हड़ खरीदते हैं, तो उसका सीधा लाभ इन्हें बनाने वाले मेहनतकश कारीगरों तक पहुंच सकता है। इससे न केवल उनकी आजीविका को सहारा मिलता है, बल्कि पारंपरिक कला और हुनर को भी आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।
स्थानीय लोगों से सहयोग की अपील
ग्राम भदिला के इस प्रजापति कारीगर की मेहनत समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण है। वह अपने पारंपरिक हुनर के सहारे परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयासरत हैं। उनकी मेहनत यह संदेश देती है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और ईमानदारी से किया गया श्रम सम्मान का हकदार है। इस दीपावली लोगों से अपील है कि वे अपने घरों को रोशन करने के लिए स्थानीय कुम्हारों और प्रजापति समाज के कारीगरों से मिट्टी के दीये जरूर खरीदें। आपकी छोटी-सी खरीदारी किसी मेहनतकश परिवार के लिए आर्थिक सहारा बन सकती है। आइए, इस दीपावली भारतीय परंपरा को अपनाएं, स्थानीय कारीगरों का सम्मान करें और उनके घरों में भी खुशियों का दीप जलाने में अपना योगदान दें
संवाददाता — दिनेश सिंह अग्निवंशी

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