सावन: स्मृति, प्रेम और विश्वास

बरसों बाद उस दिन सावन ने जैसे पूरे गाँव को अपनी बाँहों में भर लिया था। सुबह से ही आसमान पर काले बादलों का डेरा था। हवा में भीगी मिट्टी की सौंधी महक घुली हुई थी। आम के पेड़ों से टपकती बूंदें, खेतों में झूमती धान की पौध और दूर मंदिर की घंटियों के साथ मिलकर प्रकृति एक मधुर राग छेड़ रही थी।

गाँव के किनारे बने छोटे से मिट्टी के घर की चौखट पर बैठी गौरी बारिश को अपलक निहार रही थी। उसकी हथेलियाँ बरसती बूंदों को छू लेना चाहती थीं, लेकिन मन किसी अनजानी उदासी से भरा था। हर सावन उसके लिए केवल ऋतु नहीं, स्मृतियों का मौसम था।
कहते हैं, बारिश केवल धरती को नहीं भिगोती, वह मन के सूखे कोनों तक भी पहुँच जाती है। गौरी के मन में भी आज कई वर्षों से दबे हुए भाव उमड़ रहे थे।
दस वर्ष पहले की बात थी। इसी सावन की पहली बारिश में उसकी मुलाकात गाँव के स्कूल के नए शिक्षक आरव से हुई थी। उस दिन गौरी खेत से लौट रही थी। अचानक तेज वर्षा शुरू हो गई। वह एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर खड़ी हो गई। तभी साइकिल पर भीगते हुए एक युवक ने मुस्कुराकर पूछा, "क्या मैं भी यहाँ रुक सकता हूँ?"
गौरी ने संकोच से सिर हिला दिया।
दोनों चुपचाप बारिश को देखते रहे। हवा के झोंकों से पेड़ की पत्तियाँ काँप रही थीं और बूंदें उनके चेहरों पर गिर रही थीं। उस मौन में भी जैसे अनगिनत बातें थीं।
कुछ दिनों बाद आरव गाँव के बच्चों को पढ़ाने लगा। वह केवल किताबों का शिक्षक नहीं था; वह बच्चों को सपने देखना भी सिखाता था। गौरी भी कभी-कभी स्कूल के पास से गुजरती और बच्चों की हँसी सुनकर ठहर जाती।
धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। वे अक्सर सावन की शामों में नदी किनारे मिलते। आरव कहता, "बारिश की हर बूंद उम्मीद है। जब तक बादल बरसते रहेंगे, जीवन में हरियाली बनी रहेगी।"
गौरी मुस्कुरा देती। उसे लगता था कि बारिश सचमुच बोलती है।
लेकिन जीवन हर कहानी को सरल अंत नहीं देता।
एक वर्ष गाँव में भयंकर बाढ़ आई। नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। चारों ओर पानी ही पानी था। लोगों को बचाने के लिए आरव दिन-रात नाव लेकर निकल पड़ा। उसने अनेक परिवारों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।
उसी रात एक बूढ़ी महिला और उसके पोते को बचाने के प्रयास में नाव पलट गई। तेज धारा आरव को अपने साथ बहा ले गई।
उसका शरीर कभी नहीं मिला।
पूरा गाँव शोक में डूब गया। गौरी की दुनिया जैसे उसी दिन थम गई। उसके बाद हर सावन उसके लिए इंतजार बन गया।
लोग कहते थे कि समय हर घाव भर देता है, पर कुछ घाव समय के साथ और गहरे हो जाते हैं। गौरी ने विवाह नहीं किया। उसने अपने जीवन को गाँव के बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वह उसी स्कूल में पढ़ाने लगी जहाँ कभी आरव बच्चों को सपने दिखाया करता था।
बरसों बीत गए।
आज फिर वही सावन था।
बारिश पहले से कहीं अधिक तेज हो गई थी। बच्चे स्कूल से लौटते हुए पानी में कागज़ की नाव बहा रहे थे। उनकी खिलखिलाहट सुनकर गौरी मुस्कुरा उठी।
तभी एक छोटा-सा लड़का उसके पास आया।
"दीदी, मेरी नाव डूब गई।"
गौरी ने उसके आँसू पोंछे और बोली, "नाव डूब जाए तो नई बना लेते हैं। सपने कभी नहीं डूबते।"
यह कहते ही उसे लगा जैसे यही शब्द उसने कभी आरव से सुने थे।
उसने बच्चे के साथ मिलकर नई नाव बनाई। दोनों ने उसे बहते पानी में छोड़ दिया। नाव लहरों पर तैरती चली गई।
बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।
गौरी स्कूल के पुराने बरामदे में पहुँची। दीवार पर आज भी आरव की धुंधली तस्वीर टंगी थी। उसने तस्वीर पर जमी धूल साफ की। तस्वीर में वही मुस्कुराहट थी—सादा, निश्छल और आश्वस्त करने वाली।
उसकी आँखें नम हो गईं।
"तुमने कहा था, बारिश उम्मीद होती है। देखो, तुम्हारी उम्मीद अब इन बच्चों की आँखों में रहती है," उसने मन ही मन कहा।
अचानक बाहर से बच्चों की आवाज आई—"मैडम, आइए! इंद्रधनुष निकल आया है।"
गौरी बाहर आई।
काले बादलों के बीच सूरज की हल्की किरणें फूटी थीं और आकाश में सात रंगों का विशाल इंद्रधनुष फैल गया था।
उसने महसूस किया कि जीवन भी शायद ऐसा ही होता है। दुख और सुख, धूप और बारिश—दोनों साथ मिलकर रंगों का संसार बनाते हैं।
उस दिन गाँव के बुजुर्गों ने निर्णय लिया कि स्कूल का नाम बदलकर "आरव स्मृति विद्यालय" रखा जाएगा। बच्चों ने तालियाँ बजाईं।
गौरी की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे केवल दुःख के आँसू नहीं थे। उनमें गर्व, प्रेम और संतोष भी था।
शाम ढलने लगी। बारिश अब रिमझिम फुहारों में बदल चुकी थी। खेतों में पानी भर गया था। मेंढकों की टर्र-टर्र, झींगुरों की आवाज और मिट्टी की सुगंध वातावरण को और भी जीवंत बना रहे थे।
गौरी धीरे-धीरे उसी पीपल के पेड़ तक पहुँची जहाँ वर्षों पहले पहली बार आरव से मुलाकात हुई थी।
पेड़ अब और विशाल हो चुका था।
उसने तने को छुआ और आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे हवा में कोई परिचित स्वर तैर रहा हो—
"जीवन रुकता नहीं, वह हर सावन के साथ फिर से जन्म लेता है।"
गौरी ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा। बारिश की कुछ बूंदें उसके चेहरे पर गिरीं। उसने उन्हें आँसू नहीं बनने दिया।
उसने मन ही मन निश्चय किया कि गाँव का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा। यही आरव के प्रति उसकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अगले दिन से उसने निर्धन बच्चों के लिए निःशुल्क पुस्तकालय शुरू किया। गाँव के लोग भी उसके साथ जुड़ते गए। धीरे-धीरे वह छोटा-सा विद्यालय पूरे क्षेत्र में शिक्षा और संस्कार का केंद्र बन गया।
हर वर्ष जब सावन आता, बच्चे विद्यालय के प्रांगण में पौधे लगाते। वे कहते, "यह बारिश केवल खेतों के लिए नहीं, हमारे सपनों के लिए भी है।"
गौरी उन्हें देखकर संतोष से भर उठती।
अब सावन उसे रुलाता नहीं था। वह उसे याद दिलाता था कि प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। वह रूप बदलकर सेवा, प्रेरणा और स्मृति बन जाता है।
बरसात की हर बूंद मानो यही संदेश लेकर आती—जो लोग प्रेम से दुनिया को सींचते हैं, वे कभी सचमुच विदा नहीं होते। वे मिट्टी की खुशबू, बच्चों की मुस्कान, पेड़ों की हरियाली और सावन की बारिश में हमेशा जीवित रहते हैं।
उस शाम जब अंतिम बार बादलों ने गरजकर वर्षा की, गौरी ने दोनों हथेलियाँ आकाश की ओर फैला दीं। बूंदें उसकी हथेलियों पर ठहरती रहीं।
वह मुस्कुराई और धीरे से बोली—
"सावन, अब तुम केवल मौसम नहीं रहे। तुम स्मृति भी हो, प्रेरणा भी हो और जीवन का वह विश्वास भी, जो हर बार गिरकर फिर से उठना सिखाता है।"
बारिश निरंतर बरसती रही, और उसके साथ बहती रही एक ऐसी कहानी, जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।

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