प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्व करमा पूजा गुजरात के सूरत शहर में
सूरत - झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से गहराई से जुड़ा करमा पर्व केवल झारखंड की धरती तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों में रह रहे प्रवासी झारखंडी भी अपनी माटी, संस्कृति और लोक आस्था को पूरी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ जीवंत रखे हुए हैं। इसी सांस्कृतिक विरासत की सुंदर झलक गुजरात के सूरत शहर में देखने को मिली,जहां प्रवासी झारखंडी समाज की माताओं, बहनों और बेटियों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करमा पर्व मनाया। करमा पर्व के अवसर पर महिलाओं ने करम वृक्ष की पवित्र डाली को साक्षी मानकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। व्रत एवं पूजा के माध्यम से उन्होंने अपने भाइयों की सुख-समृद्धि, दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना की। इस दौरान पारंपरिक करमा गीत,लोक संगीत और पूजा की विधियों ने पूरे वातावरण को झारखंड की मिट्टी की खुशबू से भर दिया।
प्रवासी समाज के प्रमुख लोगों की रही उपस्थिति
करमा पर्व के इस आयोजन में झारखंड प्रवासी एकता मंच के संयोजक राजकुमार मंडल, अध्यक्ष राजेश वर्मा जी सहित दिनेश तुरी,बाबलू कुमार,पंकज,उमेश,संतोष एवं वासुदेव समेत समाज के अनेक गणमान्य एवं सम्मानित सज्जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। समाज के लोगों ने करमा पर्व की पूजा-अर्चना में सहभागिता करते हुए झारखंड की लोक परंपरा, संस्कृति और सामाजिक एकता को मजबूत करने का संदेश दिया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने कहा कि प्रवासी जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद अपनी माटी, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सूरत जैसे औद्योगिक एवं बहुसांस्कृतिक शहर में झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों परिवार लंबे समय से निवास कर रहे हैं। रोजगार, व्यवसाय और बेहतर भविष्य की तलाश में अपनी जन्मभूमि से दूर रहने के बावजूद प्रवासी झारखंडी समाज अपनी माटी, भाषा, लोक परंपरा, संस्कृति और आस्था से निरंतर जुड़ा हुआ है। करमा पर्व इसी सांस्कृतिक जुड़ाव और अपनी जड़ों के प्रति प्रेम का जीवंत उदाहरण है।
करमा पर्व केवल पूजा का पर्व नहीं,बल्कि प्रकृति,परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, पारिवारिक सुख-समृद्धि, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करता है। करम वृक्ष की पूजा के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव भी व्यक्त किया जाता है।
इस अवसर पर प्रवासी समाज ने यह संदेश भी दिया कि नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना हम सभी की जिम्मेदारी है। आधुनिक जीवनशैली और महानगरों की भागदौड़ के बीच ऐसे पारंपरिक पर्व बच्चों और युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी पहचान और अपनी संस्कृति से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं। प्रवासी झारखंडी समाज की भावना है कि स्थान बदल सकता है, लेकिन अपनी माटी से रिश्ता कभी नहीं बदलता। झारखंड से हजारों किलोमीटर दूर सूरत में करमा पर्व का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि झारखंड की लोक संस्कृति जहां भी झारखंडी समाज रहेगा, वहां अपनी परंपरा, आस्था और पहचान के साथ जीवंत रहेगी। करमा पर्व के माध्यम से सूरत में प्रवासी झारखंडियों ने एक बार फिर यह संदेश दिया।
रिपोर्टर - सचिन सिंह
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