सूरत में LPG का हाहाकार: उधना स्टेशन पर मची भगदड़, यात्रियों पर बरसीं लाठियां!

सात समंदर पार मिडिल-ईस्ट में छिड़ी जंग की तपिश अब सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री तक पहुँच चुकी है. गैस के संकट ने लाखों मजदूरों के पेट पर लात मार दी है और आलम यह है कि उधना रेलवे स्टेशन जंग का मैदान बन गया है. यूपी-बिहार जाने वाली ट्रेनों में एक सीट के लिए ऐसी मारामारी मची कि पुलिस को लाठियां भांजनी पड़ीं. देखिए पलायन के इस दर्द और स्टेशन पर मची उस भगदड़ की दहला देने वाली रिपोर्ट...

रविवार की सुबह उधना स्टेशन पर नजारा किसी डरावनी फिल्म जैसा था. जब 11:30 बजे उधना-हसनपुर ट्रेन के लिए कतारें लगीं, तो सब्र का बांध टूट गया. पुलिस और RPF ने जब भीड़ को काबू करने के लिए लाठीचार्ज किया, तो लोग अपनी जान बचाने के लिए लोहे की ऊंची जालियों के ऊपर से कूदने लगे. दोपहर तक 6 ट्रेनों में 21,000 यात्री रवाना हुए, लेकिन स्टेशन पर अभी भी हजारों की भीड़ टस से मस नहीं हो रही है. सूरत की पहचान उसकी टेक्सटाइल इंडस्ट्री से है, लेकिन एलपीजी की किल्लत ने यहाँ ताले डलवा दिए हैं:

करीब 3 लाख (30%) मजदूर अब तक सूरत छोड़कर जा चुके हैं.
6.5 करोड़ मीटर से घटकर उत्पादन मात्र 4.5 करोड़ मीटर रह गया है.
इंडस्ट्री को 15,000 सिलेंडरों की दरकार है, लेकिन सप्लाई न के बराबर है.

अधिकारी अनुभव सक्सेना का कहना है कि वे लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं और स्पेशल ट्रेनें भी चला रहे हैं, लेकिन समर वेकेशन और इस 'मजबूरी वाले पलायन' ने भीड़ को अनियंत्रित कर दिया है. जो लोग कतार तोड़ रहे थे, उन पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा.

यह सिर्फ भीड़ की तस्वीर नहीं है, बल्कि एक आर्थिक संकट की चेतावनी है. अगर गैस की सप्लाई जल्द बहाल नहीं हुई, तो सूरत की ये इंडस्ट्री पूरी तरह घुटनों पर आ सकती है. रेलवे के दावों और स्टेशन की तस्वीरों के बीच का यह अंतर डराने वाला है. क्या प्रशासन इस पलायन को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा? 

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