कृष्ण के रंग में रंगी सूरदास की वाणी
जब शब्दों में भक्ति उतरती है और भावों में कृष्ण बस जाते हैं, तो जन्म लेती है सूरदास जी की अमर वाणी। आइए, जानते हैं सूरदास जी के कुछ चुनिंदा दोहे —
जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥
भावार्थ :- सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार और दुष्ट मन! यदि तुझे लज्जा ही नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ? क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान का भजन नहीं किया।
मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज।
और नहीं जग मैं कोउ मेरौ, तुमहिं सुधारन काज ॥
भावार्थ :- हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है। आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं!
गनिका, गीध, अजामिल तारे, सबरी औ गजराज ।
सूर पतित पावन करि कीजै, बाहँ गहे की लाज ॥
भावार्थ :- आपने अनेकों का उद्धार किया है जिनमें गणिका, गीध, अजामिल, शबरी, गजराज आदि हैं। इस पतित सूरदास को भी पावन बनाकर हाथ पकड़े हुए की लज्जा रख लीजिये।
खान-पान-परिधान मैं, जीवन गयौ सब बीति।
ज्यों बिट पर-तिय-सँग बस्यौ, भोर भए भई भीति ॥
भावार्थ :- खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे ही जब मृत्यु रूपी सवेरा निकट आता है, तो मायारूपी परस्त्री में अनुरक्त होकर जीवनरूपी रात्रि व्यर्थ बिताने वाला जीव भय से काँपने लगता है।
सब रस कौ रस प्रेम है, विषयी खेलै सार।
तन-मन-धन-जोबन खसै, तऊ न मानै हार ॥
भावार्थ :- संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देता है। वह सब कुछ नष्ट कर बैठता है, फिर भी हार स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसका चित्त पूरी तरह उसी खेल में आसक्त हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम-रस में प्रविष्ट व्यक्ति भी अपने सर्वस्व को अर्पित कर देता है और किसी भी दशा में पीछे नहीं हटता।
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