सोशल मीडिया बयानबाजी से भटका मूल मुद्दा, अपार्जनिक टिप्पणी ने बढ़ाया राजनीतिक तनाव

सरगुजा : सरगुजा जिले के बतौली विकासखंड में आंगनवाड़ी भवन निर्माण को लेकर उठे विवाद ने बीते दिनों प्रशासनिक सीमा से बाहर निकलकर सामाजिक और राजनीतिक रंग ले लिया है। प्रारंभिक जांच और उपलब्ध दस्तावेजों से यह तथ्य सामने आ रहा है कि संबंधित आंगनवाड़ी भवन शासन द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया के तहत चिन्हित सरकारी भूमि पर निर्माणाधीन था।

हालांकि जिस भूमि पर भवन प्रस्तावित है, उस पर एक परिवार लंबे समय से कब्जाधारी के रूप में निवासरत रहा है। इसी बिंदु को लेकर चार दिव्यांग सदस्यों वाला परिवार विरोध में सामने आया और इच्छामृत्यु की मांग को लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुँचा। प्रशासन ने मामले की गंभीरता को स्वीकारते हुए स्पष्ट किया है कि दिव्यांग परिवार की पीड़ा और भूमि से जुड़े तथ्यों की जांच स्वतंत्र रूप से की जा रही है, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
मामला उस समय और जटिल हो गया जब इस विषय पर सोशल मीडिया पर सक्रिय इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो द्वारा लगातार वीडियो और पोस्ट साझा किए गए। आरोप है कि इन पोस्टों में जनहित के मुद्दे उठाने के बजाय छत्तीसगढ़ शासन की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो पर व्यक्तिगत, अपार्जनिक एवं मर्यादाहीन टिप्पणियाँ की गईं।
स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इस भाषा और प्रस्तुति को अस्वीकार्य बताया है। भाजपा महिला मोर्चा, सीतापुर ने इसे गंभीर मामला बताते हुए थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। संगठन का कहना है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन बिना तथ्यात्मक पुष्टि के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को लक्ष्य बनाना और अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।
संगठन और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार विधायक रामकुमार टोप्पो का आंगनवाड़ी भवन निर्माण प्रक्रिया में कोई प्रत्यक्ष या व्यक्तिगत हस्तक्षेप नहीं रहा है। निर्माण कार्य शासन के तय मानकों और विभागीय प्रक्रिया के तहत स्वीकृत बताया जा रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से विधायक पर लगाए गए आरोपों को भ्रामक और तथ्यहीन करार दिया जा रहा है।
पुलिस ने शिकायत के आधार पर सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो, पोस्ट और डिजिटल सामग्री की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर विधिक कार्रवाई की जाएगी।
वहीं जिला प्रशासन ने यह भी साफ किया है कि यह मामला दो स्तरों पर देखा जा रहा है—
एक ओर दिव्यांग परिवार से जुड़े मानवीय और प्रशासनिक पहलुओं की निष्पक्ष जांच,
और दूसरी ओर सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक बयानबाजी की कानूनी समीक्षा।
यह पूरा प्रकरण अब एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है—
क्या सोशल मीडिया पर जनहित के नाम पर तथ्य और जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया जा सकता है?
और क्या व्यक्तिगत टिप्पणी से किसी सार्वजनिक मुद्दे का समाधान संभव है?
बतौली और सीतापुर का यह घटनाक्रम स्पष्ट संकेत देता है कि
लोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं,
लेकिन सवालों की सच्चाई, भाषा और जिम्मेदारी उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।क्योंकि जब तथ्य पीछे छूट जाते हैं,तो मुद्दा नहीं, विवाद चर्चा का केंद्र बन जाता है।

रिपोर्टर : रिंकू सोनी

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