दुर्गाबाड़ी में आयोजन पर धार्मिक मर्यादा के सवाल, अमित गुप्ता ने जताई आपत्ति

 सरगुजा : विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बतौली के बाजार रोड स्थित दुर्गाबाड़ी परिसर में आयोजित कार्यक्रम अब राजनीतिक मौजूदगी से ज्यादा धार्मिक मर्यादा और आयोजन व्यवस्था को लेकर चर्चा में है। आदिवासी समाज के सम्मान और अधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण दिवस पर विशाल रैली निकाली गई और कार्यक्रम आयोजित हुआ। छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के.आर. शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि पूर्व मंत्री अमरजीत भगत सहित कांग्रेस के कई नेता एवं कार्यकर्ता भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

लेकिन आयोजन समाप्त होने के बाद दुर्गाबाड़ी जैसे धार्मिक परिसर में कार्यक्रम की व्यवस्था को लेकर सवालों ने आयोजकों की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भाजपा नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता अमित गुप्ता ने कार्यक्रम स्थल पर जूते-चप्पल पहनकर प्रवेश, धार्मिक स्थल के सामने मंच लगाए जाने और भीड़ के बीच धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की व्यवस्था को लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।
अमित गुप्ता का कहना है कि आदिवासी दिवस का सम्मान हम भी करते हैं और आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, अधिकार एवं गौरव का सम्मान होना चाहिए। सवाल आयोजन का नहीं, बल्कि आयोजन के लिए जगह और व्यवस्था के चयन का है।

सम्मान करना है तो सही जगह और सही व्यवस्था भी जरूरी
अमित गुप्ता ने कहा कि किसी समाज के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित करना अच्छी बात है, लेकिन कार्यक्रम के लिए स्थान का चयन भी उतनी ही गंभीरता से किया जाना चाहिए।
उनका सवाल है कि यदि दुर्गाबाड़ी धार्मिक आस्था का केंद्र है तो क्या वहां इतने बड़े सामाजिक और राजनीतिक आयोजन से पहले धार्मिक परंपराओं एवं स्थानीय मान्यताओं को ध्यान में रखा गया था?
उन्होंने कहा कि आदिवासी दिवस मनाने के लिए क्षेत्र में कई स्थान उपलब्ध हो सकते हैं, लेकिन धार्मिक स्थल की अपनी मर्यादा और संवेदनशीलता होती है। यदि आयोजन स्थल धार्मिक परिसर ही चुना गया था तो वहां की परंपराओं के अनुरूप पूरी व्यवस्था करना आयोजकों की जिम्मेदारी थी।

मंदिर के सामने मंच—क्या यही था बेहतर विकल्प?
विवाद का प्रमुख बिंदु धार्मिक स्थल के सामने मंच लगाए जाने को लेकर है। अमित गुप्ता ने सवाल किया कि मंच लगाने का निर्णय किसने लिया और क्या दुर्गाबाड़ी की धार्मिक व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार लोगों से पहले अनुमति अथवा सहमति ली गई थी?
उन्होंने कहा कि मंच कहां लगाया जाए, भीड़ किस दिशा में बैठे, धार्मिक स्थल के प्रवेश और पूजा क्षेत्र की गरिमा कैसे सुरक्षित रहे—इन सभी विषयों पर आयोजन से पहले निर्णय होना चाहिए था।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि आयोजन के लिए अनुमति और सहमति ली गई थी, तो क्या धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की शर्तों और व्यवस्थाओं का पालन सुनिश्चित किया गया था?

जूते-चप्पल में प्रवेश ने बढ़ाए सवाल
अमित गुप्ता ने दुर्गाबाड़ी परिसर में जूते-चप्पल पहनकर प्रवेश को लेकर भी सवाल उठाया है।
उनका कहना है कि धार्मिक स्थल में प्रवेश की अपनी परंपराएं होती हैं। इतने बड़े कार्यक्रम में जब हजारों लोगों के आने की संभावना हो, तो आयोजकों को पहले से यह तय करना चाहिए था कि जूते-चप्पल कहां रखे जाएंगे, कौन सा क्षेत्र धार्मिक रहेगा और कार्यक्रम क्षेत्र को किस तरह अलग रखा जाएगा।
सवाल यह भी है कि क्या आयोजन समिति ने स्वयंसेवकों के माध्यम से लोगों को धार्मिक स्थल की मर्यादा के संबंध में जानकारी दी थी?
यदि व्यवस्था की गई थी तो उसके बावजूद ऐसी स्थिति क्यों बनी और यदि व्यवस्था नहीं थी तो इतने बड़े आयोजन की तैयारी किस आधार पर की गई?

भीड़ बड़ी थी तो जिम्मेदारी भी बड़ी होनी चाहिए थी
कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष के.आर. शाह, पूर्व मंत्री अमरजीत भगत सहित कई प्रमुख लोगों की मौजूदगी रही। ऐसे में अमित गुप्ता का कहना है कि जितना बड़ा आयोजन, उतनी बड़ी जिम्मेदारी।
उन्होंने कहा कि केवल मंच तैयार कर देना और भीड़ जुटा लेना आयोजन की सफलता नहीं है। असली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि कार्यक्रम स्थल की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता प्रभावित न हो।
उन्होंने आयोजकों से पूछा कि क्या कार्यक्रम से पहले इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया गया था?

कुछ लोगों के व्यवहार पर भी उठे सवाल
कार्यक्रम में बड़ी भीड़ के बीच कुछ लोगों के अनुशासनहीन व्यवहार और कथित तौर पर  नशीले पदार्थों के सेवन से जुड़े सवाल भी चर्चा में आने की बात कही जा रही है। हालांकि इस संबंध में किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कोई पुष्ट तथ्य याआधिकारिक कार्रवाई सामने नहीं आई है।
अमित गुप्ता का कहना है कि बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में आयोजकों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नशे या उपद्रव की स्थिति पैदा करने वाले किसी भी व्यक्ति के कारण धार्मिक स्थल की गरिमा और आम लोगों की सुरक्षा प्रभावित न हो।
उन्होंने कहा कि यदि कार्यक्रम धार्मिक परिसर में आयोजित किया जा रहा है तो अनुशासन और निगरानी की जिम्मेदारी सामान्य मैदान में होने वाले कार्यक्रम से कहीं अधिक होती है।

आदिवासी समाज का सम्मान, किसी की आस्था की कीमत पर नहीं
अमित गुप्ता ने कहा कि इस पूरे मुद्दे को आदिवासी समाज के विरोध के रूप में देखना गलत होगा।
उन्होंने कहा हम आदिवासी समाज का सम्मान करते हैं* 
विश्व आदिवासी दिवस उनके अधिकार, संस्कृति, परंपरा और गौरव से जुड़ा महत्वपूर्ण दिवस है। लेकिन किसी समाज के सम्मान के लिए कार्यक्रम करते समय धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपराओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। आयोजन के लिए सही स्थान और सही व्यवस्था का चयन किया जाता तो विवाद की स्थिति ही नहीं बनती।”
उन्होंने कहा कि किसी आयोजन का उद्देश्य कितना भी अच्छा हो, यदि व्यवस्था को लेकर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने की स्थिति पैदा होती है तो आयोजकों को उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी के बीच आयोजकों की जिम्मेदारी पर सवाल
कार्यक्रम में कांग्रेस से जुड़े कई नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत की मौजूदगी तथा कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता ‘पालू’ से जुड़े आयोजन को लेकर अब विपक्षी सवाल भी सामने आने लगे हैं।
अमित गुप्ता ने कहा कि राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी वाले किसी भी बड़े कार्यक्रम में आयोजकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। कार्यक्रम सामाजिक हो या राजनीतिक, धार्मिक स्थल की मर्यादा किसी पार्टी की राजनीति से ऊपर होती है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या आयोजन से पहले धार्मिक स्थल के जिम्मेदार लोगों से चर्चा की गई थी? यदि की गई थी तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं है?
विवाद आदिवासी दिवस से नहीं, आयोजन स्थल और व्यवस्था से है
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि विवाद विश्व आदिवासी दिवस मनाने को लेकर नहीं है। आदिवासी समाज का सम्मान हर वर्ग करता है और उनके अधिकार, संस्कृति तथा गौरव का सम्मान किया जाना चाहिए। सवाल सिर्फ इतना है कि जिस स्थान पर आयोजन किया गया, क्या वह इस तरह के विशाल कार्यक्रम के लिए उपयुक्त था?
यदि धार्मिक स्थल का चयन किया गया तो क्या उसकी मर्यादा के अनुरूप व्यवस्था की गई?
और यदि व्यवस्था में कमी रही तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
आदिवासी सम्मान भी जरूरी, धार्मिक आस्था भी—फिर ऐसी जगह क्यों चुनी गई जहां दोनों के बीच विवाद की नौबत आए?
अब गेंद आयोजकों के पाले में है। सवाल उठ चुके हैं, आपत्ति दर्ज हो चुकी है और अब जनता आयोजकों के स्पष्ट जवाब का इंतजार कर रही है। उनका पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दुर्गाबाड़ी परिसर में आयोजन के दौरान धार्मिक मर्यादा और व्यवस्थाओं को लेकर वास्तव में क्या प्रबंध किए गए थे।

रिपोर्टर : रिंकू सोनी

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.