निराला: पीड़ा, मेहनत और आशा की कविता

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” (1896–1961) हिंदी साहित्य के प्रमुख आधुनिक कवि थे। वे छायावाद और आधुनिक हिंदी कविता के महान प्रतिनिधि माने जाते हैं। निराला की कविताओं में भावनाओं की गहराई, प्रकृति की सुंदरता और सामाजिक संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे केवल कवि नहीं थे, बल्कि आलोचक, निबंधकार और लेखक भी थे। उनकी लेखनी में व्यक्तिगत पीड़ा, मानवीय संवेदना और स्वतंत्र विचारधारा का अद्भुत मिश्रण मिलता है।


सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” की प्रसिद्ध कविता

नीचे उनकी एक लोकप्रिय कविता “वह तोड़ती पत्थर” प्रस्तुत है, जो उनकी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती है:

वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—

वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार

पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,

नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,

करती बार-बार प्रहार :—
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन

दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,

रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं,

प्राय: हुई दुपहर :—
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;

देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से

जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,

सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,

ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा—

‘मैं तोड़ती पत्थर।’

यह कविता साधारण मजदूर की पीड़ा और संघर्ष को दर्शाती है और समाज के प्रति कवि की संवेदनशील दृष्टि को उजागर करती है।

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