गुरुजनों का जीवन में महत्व

मानव जीवन की यात्रा ज्ञान, अनुभव और संस्कारों के सहारे ही पूर्णता प्राप्त करती है। इस यात्रा में हमारे माता–पिता, शिक्षक, आचार्य और मार्गदर्शक—ये सभी गुरु के रूप में कार्य करते हैं। ‘गुरु’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला’। संस्कृत में कहा गया है:

“गुकारः अन्धकारस्य, रुकारः तन्निवारकः।
अन्धकारनिवर्तित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥”

अर्थात् ‘गु’ का अर्थ अज्ञान का अंधकार और ‘रु’ का अर्थ प्रकाश या ज्ञान है। जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाए, वही सच्चा गुरु है।

गुरुजनों का महत्व केवल शिक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनका योगदान हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण, जीवन–मूल्यों की स्थापना और समाज निर्माण तक विस्तृत है। आइए इस लेख में हम विस्तार से समझें कि गुरुजनों का जीवन में क्या महत्व है और क्यों उन्हें देवताओं से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यंत उच्च स्थान प्रदान किया गया है। वेद, पुराण, उपनिषद और स्मृतियों में गुरु की महिमा का गुणगान मिलता है।

वेदों में गुरु को ईश्वर का प्रतिरूप माना गया है।

महाभारत में संदीपनी गुरु के आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने भी शिक्षा प्राप्त की।

रामायण में भगवान राम ने महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र से शिक्षा लेकर आदर्श जीवन का मार्ग सीखा।

संत कबीरदास ने भी गुरु के महत्व को इन शब्दों में प्रकट किया है:
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥”

अर्थात जब गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए, क्योंकि वही हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।

आज के युग में तकनीकी प्रगति और भौतिकता ने जीवन की गति को तेज़ बना दिया है। सूचना तो हमें इंटरनेट और पुस्तकों से मिल जाती है, लेकिन उसे सही दिशा में उपयोग करना, विवेक से काम लेना और नैतिकता का पालन करना केवल गुरु ही सिखा सकते हैं।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भी ‘मेंटॉरशिप’ और ‘गाइडेंस’ का महत्व इसी कारण से बढ़ा है।

कॉर्पोरेट और व्यावसायिक क्षेत्रों में भी अनुभवी गुरु (मेंटॉर) सफलता की कुंजी बनते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से भी आज लोग जीवन की भागदौड़ और तनाव से मुक्ति पाने के लिए गुरु की शरण लेते हैं।

गुरुजनों का जीवन में महत्व अपार है। वे हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं, हमें संस्कारित करते हैं, समाज का निर्माण करते हैं और हमें आत्मज्ञान तक पहुँचाने का मार्ग दिखाते हैं। गुरु के बिना जीवन अधूरा है, जैसे दीपक के बिना प्रकाश या आँखों के बिना दृष्टि।

गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करना हर इंसान का परम कर्तव्य है। उनकी शिक्षाएँ ही हमें एक सफल, चरित्रवान और आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।

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