सागौन की खेती कैसे करें? पूरी उत्पादन तकनीक जानिए

सागौन (वैज्ञानिक नाम: Tectona grandis) एक उच्च मूल्यवान कठोर लकड़ी वाला वृक्ष है, जो मुख्य रूप से भारत, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया में पाया जाता है। भारत में यह वृक्ष मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, ओडिशा और दक्षिण भारत के राज्यों में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। सागौन की लकड़ी अपनी मजबूती, दीमक-रोधी गुण और आकर्षक बनावट के कारण फर्नीचर, जहाज निर्माण, दरवाजे-खिड़कियों आदि में अत्यधिक उपयोग की जाती है।

1. जलवायु एवं मृदा (Climate and Soil Requirements)

सागौन के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
तापमान: 13°C से 39°C के बीच आदर्श रहता है।
वर्षा: 1000–2500 मिमी वार्षिक वर्षा आवश्यक।
मिट्टी: गहरी, जल निकासी युक्त, दोमट या लाल दोमट मृदा उत्तम रहती है।
जलजमाव वाले क्षेत्र इसके लिए हानिकारक हैं।

2. बीज तैयारी एवं अंकुरण (Seed Preparation & Germination)

सागौन के बीज कठोर होते हैं, इसलिए इन्हें बोने से पहले ट्रीटमेंट (बीज उपचार) आवश्यक है।
बीजों को 12–24 घंटे तक पानी में भिगोकर फिर 2–3 दिन छाया में सुखाया जाता है।
अंकुरण दर बढ़ाने के लिए बीजों को गुनगुने पानी में डालना लाभदायक होता है।
अंकुरण 15–25 दिनों में शुरू हो जाता है।

3. पौधशाला (Nursery Management)

सागौन की पौध तैयार करने के लिए पॉलीबैग विधि या बेड़ विधि (bed method) अपनाई जाती है।
पॉलीबैग का आकार: 10 × 20 सेमी या 12 × 25 सेमी।
एक एकड़ के लिए लगभग 2500–3000 पौधों की आवश्यकता होती है।
पौध को 3–4 महीने बाद खेत में रोपाई के लिए तैयार किया जाता है।

4. रोपण तकनीक (Planting Technique)

रोपण का समय: जून से अगस्त (बरसात के मौसम की शुरुआत)।
दूरी: 3 × 3 मीटर या 4 × 4 मीटर का अंतर आदर्श रहता है।
गड्ढे: 45 × 45 × 45 सेमी आकार के गड्ढे बनाकर उसमें गोबर खाद या जैविक खाद मिलाना चाहिए।
घनत्व: एक हेक्टेयर में लगभग 625 से 1100 पौधे लगाए जा सकते हैं।

5. सिंचाई एवं रखरखाव (Irrigation & Maintenance)

शुरुआती 2 वर्ष पौधों को नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है।
गर्मियों में 10–12 दिन के अंतराल पर पानी देना लाभकारी है।
खेत में खरपतवार नियंत्रण और गड्ढों की मिट्टी की ढाल पर ध्यान देना जरूरी है।
पौधों की ऊँचाई 2–3 वर्ष में 2 से 4 मीटर तक पहुँच जाती है।

6. छंटाई एवं पतलापन (Pruning & Thinning)

वृक्ष के सीधे और मजबूत तने के विकास के लिए पहले 2–3 वर्ष में हल्की छंटाई करनी चाहिए।
5–6 वर्ष की आयु पर पहला पतलापन (thinning) किया जाता है, ताकि शेष पेड़ों को बढ़ने की जगह मिले।
10–12 वर्ष पर दूसरा पतलापन किया जाता है।

7. रोग एवं कीट प्रबंधन (Pest & Disease Management)

मुख्य कीट: Defoliator और Skeletonizer जो पत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं।
नियंत्रण हेतु नीम आधारित जैव कीटनाशक या chlorpyrifos 0.05% का छिड़काव करें।
दीमक से बचाव के लिए गड्ढों में क्लोरपाइरीफॉस 0.5% द्रव डालना उपयोगी है।

8. कटाई एवं उपज (Harvesting & Yield)

सागौन का पेड़ सामान्यतः 20–25 वर्ष में परिपक्व हो जाता है।
प्रति हेक्टेयर से लगभग 200–250 घनफुट लकड़ी प्राप्त हो सकती है।
एक पेड़ से औसतन 10–15 घनफुट सागौन की लकड़ी मिलती है।
अच्छी देखरेख में प्रति पेड़ ₹25,000–₹50,000 तक की आय संभव है।

9. आर्थिक महत्व (Economic Importance)

सागौन की लकड़ी का बाजार मूल्य ₹2500–₹6000 प्रति घनफुट तक होता है।
यह लकड़ी फर्नीचर, निर्माण कार्य और निर्यात में अत्यधिक मांग में रहती है।
लंबे समय की निवेश फसल होने के कारण इसे “ग्रीन गोल्ड (Green Gold)” कहा जाता है।

सागौन की खेती टिकाऊ वाणिज्यिक वानिकी (commercial forestry) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यदि सही तकनीक, नियमित देखरेख और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाया जाए, तो यह किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक बनती है।

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.