जब 4 महीने योगनिद्रा में रहते हैं भगवान विष्णु, तब कौन संभालता है ब्रह्मांड की कमान?

सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है। मान्यता है कि वे संपूर्ण जगत के संचालन, संरक्षण और संतुलन की जिम्मेदारी निभाते हैं। लेकिन हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। ऐसे में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में उठता है कि जब स्वयं जगत के पालनहार योगनिद्रा में होते हैं, तब ब्रह्मांड का संचालन कौन करता है और सृष्टि की व्यवस्था किसके हाथों में रहती है?

क्या सचमुच सो जाते हैं भगवान विष्णु?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु का शयन सामान्य नींद नहीं, बल्कि योगनिद्रा होती है। योगनिद्रा का अर्थ है ऐसी दिव्य अवस्था, जिसमें भगवान बाहरी रूप से विश्राम करते हुए भी अपनी दिव्य शक्तियों के माध्यम से सृष्टि पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखते हैं। इसलिए उनके शयन का अर्थ यह नहीं है कि वे जगत की गतिविधियों से पूरी तरह अलग हो जाते हैं।

फिर कौन संभालता है सृष्टि का संचालन?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु की योगनिद्रा के दौरान भी उनकी दिव्य शक्ति पूरे ब्रह्मांड में सक्रिय रहती है। सृष्टि के संचालन की व्यवस्था देवताओं, लोकपालों और प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से चलती रहती है। भगवान शिव संहार और परिवर्तन के देवता के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं, जबकि ब्रह्मा सृष्टि की रचना संबंधी कार्यों का संचालन करते हैं।

कई पुराणों में उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु की इच्छा और शक्ति कभी निष्क्रिय नहीं होती। उनकी योगमाया और दैवी शक्तियां ही ब्रह्मांडीय व्यवस्था को संतुलित बनाए रखती हैं। यानी कमान भले ही अदृश्य रूप से भगवान विष्णु के हाथों में रहती है, लेकिन व्यवस्थाओं का संचालन उनकी शक्तियों और देवताओं के माध्यम से होता है।

चातुर्मास में क्यों रुक जाते हैं मांगलिक कार्य?

मान्यता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसका मुख्य कारण यह है कि विष्णु जी को मांगलिक कार्यों का प्रमुख देव माना जाता है। उनके शयनकाल में नए शुभ कार्यों की शुरुआत को उचित नहीं माना जाता। यही वजह है कि देवउठनी एकादशी तक अधिकांश मांगलिक कार्य स्थगित रहते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से क्या संदेश देता है चातुर्मास?

चातुर्मास केवल भगवान के शयन का समय नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए भी आत्मचिंतन और साधना का काल माना जाता है। जिस प्रकार भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी इस दौरान बाहरी भागदौड़ से कुछ दूरी बनाकर अपने भीतर झांकने, धर्म-कर्म, जप-तप और आध्यात्मिक उन्नति पर ध्यान देने की प्रेरणा दी जाती है।

क्या भगवान विष्णु की शक्ति कभी कम होती है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं। उनकी योगनिद्रा भी एक दिव्य लीला मानी जाती है। इसलिए यह मानना कि उनके सोने से ब्रह्मांड का संचालन रुक जाता है, शास्त्रीय दृष्टि से सही नहीं है। उनकी चेतना और शक्ति हर क्षण सृष्टि में विद्यमान रहती है और उसी के कारण ब्रह्मांड का संतुलन बना रहता है।

चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु भले ही योगनिद्रा में रहते हों, लेकिन ब्रह्मांड की कमान उनके हाथों से कभी नहीं निकलती। उनकी दैवी शक्तियां, देवगण और ब्रह्मांडीय व्यवस्था सृष्टि का संचालन करती रहती हैं। यही कारण है कि भगवान के शयनकाल में भी प्रकृति, समय और जीवन का चक्र बिना रुके चलता रहता है।

 

 

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