लखनऊ अग्निकांड: आखिर कब तक सिस्टम की लापरवाही लोगों की जान लेती रहेगी?

लखनऊ के अलीगंज में लगी आग सिर्फ एक हादसा नहीं थी, यह उन खामियों का विस्फोट था जो सालों से हमारे शहरों, इमारतों और व्यवस्था में पल रही हैं। कुछ ही मिनटों में 15 लोगों की जिंदगी खत्म हो गई और कई परिवार हमेशा के लिए टूट गए।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर एक इमारत में दर्जनों लोग रोज आते-जाते थे, तो वहां फायर सेफ्टी के इंतजाम कहां थे? अगर नियम थे, तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? और अगर पालन नहीं हुआ, तो जिम्मेदार लोग अब तक कार्रवाई से कैसे बचते रहे?

हर बार कहानी लगभग एक जैसी होती है। आग लगती है, लोग फंसते हैं, मौतें होती हैं, फिर जांच के आदेश दिए जाते हैं, अधिकारियों की बैठकें होती हैं और कुछ दिनों बाद मामला फाइलों में दब जाता है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों, भाइयों या बेटियों को खोया है, उनके लिए यह कोई "घटना" नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द है।

आज शहरों में जगह-जगह कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, ऑफिस और कमर्शियल गतिविधियां ऐसी इमारतों में चल रही हैं जिनकी सुरक्षा व्यवस्था पर शायद ही कभी गंभीरता से ध्यान दिया जाता हो। जब तक सब ठीक रहता है, तब तक कोई सवाल नहीं पूछता। लेकिन जैसे ही हादसा होता है, पूरा सिस्टम अचानक जाग जाता है।

यह आग सिर्फ दीवारों को नहीं जला गई, इसने उस सोच को भी बेनकाब कर दिया जिसमें सुरक्षा को खर्च समझा जाता है और नियमों को औपचारिकता।

तकनीक, विकास और स्मार्ट सिटी की बातें करने वाले देश में अगर लोग किसी इमारत से जिंदा बाहर निकलने की गारंटी भी न पा सकें, तो यह सिर्फ दुर्भाग्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता है।

अब जरूरत सिर्फ जांच की नहीं, जवाबदेही की है। यह पता लगना चाहिए कि चूक कहां हुई, किसने नियमों की अनदेखी की और किन लोगों की लापरवाही ने 15 जिंदगियां छीन लीं। क्योंकि अगर इस बार भी जिम्मेदार लोग बच गए, तो अगली आग किसी और शहर में, किसी और इमारत में, फिर किसी और परिवार की दुनिया उजाड़ देगी।

अलीगंज की आग बुझ चुकी है, लेकिन उसने एक कड़वा सच सामने ला दिया है—हम हादसों से नहीं सीखते, हम सिर्फ अगली त्रासदी का इंतजार करते हैं।

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