NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं? मोदी सरकार के सामने क्या है सियासी गणित?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के आंदोलन की सबसे बड़ी मांग है—NEET परीक्षा पेपर लीक मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें।

आंदोलनकारियों का तर्क है कि देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक NEET की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं और इसकी जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए। संसद मार्च से लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन तक, विपक्ष और प्रदर्शनकारी धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर बनाए हुए हैं।

लेकिन इन तमाम दबावों के बावजूद फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं दिख रहा कि धर्मेंद्र प्रधान पद छोड़ने की तैयारी में हैं।

यही वजह है कि अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर बीजेपी इस पूरे विवाद को शांत कर सकती है, तो फिर सरकार ऐसा कदम क्यों नहीं उठा रही?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक फैसलों के तरीके को समझना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकारों का अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि विपक्ष के दबाव या किसी आंदोलन के चलते किसी मंत्री का इस्तीफा होना बेहद दुर्लभ रहा है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक नरेंद्र मोदी ने ज्यादातर फैसले राजनीतिक दबाव के बजाय अपनी रणनीतिक सोच और संगठनात्मक समीकरणों के आधार पर लिए हैं।

2014 में केंद्र की सत्ता संभालने के बाद धर्मेंद्र प्रधान उन चुनिंदा नेताओं में शामिल रहे हैं, जो लगातार तीसरी बार मोदी सरकार का हिस्सा बने हुए हैं। इस सूची में राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, राव इंद्रजीत सिंह और डॉ. जितेंद्र सिंह जैसे नाम शामिल हैं।

अमित शाह और एस. जयशंकर जैसे नेता भी बाद में मोदी सरकार का हिस्सा बने, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय से सरकार के भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते हैं।

मोदी सरकार में धर्मेंद्र प्रधान की अहमियत

धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले हैं।

  • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री — 2014 से 2021 तक
  • कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री — 2017 से 2024 तक
  • इस्पात मंत्री — 2019 से 2021 तक
  • शिक्षा मंत्री — 2021 से अब तक

शिक्षा मंत्रालय में उनका कार्यकाल भी अब एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच चुका है। अगर वह आगे भी इस पद पर बने रहते हैं, तो वह देश के सबसे लंबे समय तक शिक्षा मंत्रालय संभालने वाले नेताओं की सूची में ऊपर पहुंच सकते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में डॉ. मुरली मनोहर जोशी करीब 6 साल 2 महीने तक शिक्षा मंत्री रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान इस अवधि के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। हालांकि उनसे आगे मौलाना अबुल कलाम आजाद, अर्जुन सिंह और के. एल. श्रीमाली जैसे दिग्गजों के लंबे कार्यकाल रहे हैं।

इस्तीफे की संभावना क्यों कम दिखाई दे रही है?

NEET पेपर लीक विवाद को लेकर विपक्ष और CJP लगातार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार की तरफ से अब तक कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है कि इस मांग पर विचार किया जा रहा है।

इसके पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।

पहला कारण यह है कि सरकार का आकलन है कि आंदोलन में ऊर्जा जरूर है, लेकिन उसे अभी व्यापक जनसमर्थन या बड़े राजनीतिक दबाव में बदलने में सफलता नहीं मिली है।

दूसरा कारण यह है कि संसद का मानसून सत्र जरूर चल रहा है, लेकिन तत्काल कोई बड़ा चुनाव सामने नहीं है। ऐसे में सरकार किसी मंत्री को हटाने का फैसला राजनीतिक दबाव में करती हुई दिखाई नहीं दे रही।

तीसरा कारण यह है कि मोदी सरकार में मंत्रियों के कामकाज पर प्रधानमंत्री कार्यालय की लगातार नजर रहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि अगर धर्मेंद्र प्रधान का प्रदर्शन सरकार की नजर में कमजोर होता, तो उन्हें लगातार इतने महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी नहीं दी जाती।

धर्मेंद्र प्रधान सिर्फ मंत्री नहीं, संगठन का चेहरा भी हैं

धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक यात्रा भी उनके महत्व को बढ़ाती है।

वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से राजनीति में आए और भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। ऐसे में उनका इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का बदलाव नहीं होगा, बल्कि बीजेपी के संगठन और सरकार के बीच संतुलन को लेकर भी एक बड़ा संदेश देगा।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, ऐसा फैसला बीजेपी, आरएसएस और सरकार के लिए कई स्तरों पर असहज स्थिति पैदा कर सकता है।

जुलाई में ही शुरू हुआ था सफर, जुलाई में ही उठी इस्तीफे की मांग

एक दिलचस्प संयोग यह भी है कि धर्मेंद्र प्रधान ने जुलाई महीने में ही शिक्षा मंत्री का पद संभाला था और अब जुलाई में ही उनके इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली की राजनीति गर्म है।

NEET विवाद के कारण संसद का मानसून सत्र भी प्रभावित हो रहा है और विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन फिलहाल राजनीतिक तस्वीर यही दिखाती है कि विपक्ष आंदोलन के जरिए दबाव बनाने में जुटा है, जबकि सरकार धर्मेंद्र प्रधान पर भरोसा बनाए हुए नजर आ रही है।

अब देखने वाली बात यही होगी कि NEET विवाद आने वाले दिनों में कितना बड़ा राजनीतिक संकट बनता है या फिर सरकार इस मुद्दे को संभालकर आगे बढ़ने में सफल रहती है।

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