तमिलनाडु में थलपति का राज: विजय ने रचा इतिहास, स्टालिन का किला ध्वस्त!

चेन्नई की सड़कों से लेकर कन्याकुमारी के तट तक...आज सिर्फ एक ही नाम की गूंज है और वो है...थलपति विजय! सिनेमा के पर्दे पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाला यह सुपरस्टार अब राजनीति के असली अखाड़े का सुल्तान बन चुका है। जो लोग कह रहे थे कि फिल्मी चमक-धमक वोटों में नहीं बदलती, आज उनकी बोलती बंद हो गई है। जी हां तमिलनाडु के चुनावी नतीजों ने इतिहास लिख दिया है! विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' यानी TVK ने 108 सीटों पर विजय पताका लहराकर दशकों पुरानी राजनीति की जड़ें हिला दी हैं। हालांकि, TVK बहुमत के 118 के जादुई आंकड़े से महज 10 कदम दूर रह गई है, जिससे यह साफ हो गया है कि तमिलनाडु में अब किंगमेकर थलपति के बिना सरकार नहीं बनेगी। और इस चुनाव की सबसे बड़ी सियासी सनसनी ये है कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को उनके अपने ही गढ़ कोलाथुर में करारी हार झेलनी पड़ी है! उनकी ही पार्टी के बागी नेता वी.एस. बाबू ने स्टालिन को 8 हजार वोटों से शिकस्त देकर डीएमके के किले को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे में यह सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि एक नए युग का आगाज़ है!

आपको बता दें आज से करीब 50 साल पहले, साल 1977 में महान M.G. रामचंद्रन ने अपनी नई पार्टी बनाकर पहली बार में ही पूर्ण बहुमत हासिल किया था। आज विजय ने उसी इतिहास को फिर से जिंदा कर दिया है। विजय ने किसी के साथ गठबंधन नहीं किया। न कांग्रेस का हाथ थामा, न बीजेपी का साथ लिया। वो एक अकेले शेर की तरह मैदान में उतरे और दशकों से जमी जमाई DMK और AIADMK जैसी बड़ी पार्टियों को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सत्ताधारी DMK मात्र 60 सीटों पर सिमटती दिखी, जबकि AIADMK 47 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर संघर्ष करती रही। यह जीत बताती है कि तमिलनाडु का युवा अब वंशवाद और पुरानी राजनीति से ऊब चुका है और उसे विजय के सिनेमैटिक विजन में अपना भविष्य दिख रहा है। वहीं विजय की इस 100+ सीटों वाली ऐतिहासिक ओपनिंग को समझने के लिए हमें फ्लैशबैक में जाना होगा। दरअसल, दक्षिण की राजनीति हमेशा से सितारों की कर्मभूमि रही है, लेकिन हर किसी को विजय नहीं मिली। 

एन.टी. रामा राव ने 1982 में तेलुगु देशम पार्टी बनाई और 9 महीने में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। 
चिरंजीवी 2009 में 'प्रजा राज्यम पार्टी' के साथ आए, भारी भीड़ जुटी लेकिन वोट सिर्फ 18 सीटों पर ही सिमट गए। वो सत्ता की रेस से बाहर रहे और बाद में पार्टी का विलय करना पड़ा।
कमल हासन की 'मक्कल नीधि मय्यम' चुनावी मैदान में खाता खोलने के लिए भी तरस गई। 
वहीं, रजनीकांत ने सालों तक सस्पेंस बनाए रखने के बाद कदम पीछे खींच लिए।
पवन कल्याण की शुरुआत बेहद खराब रही, खुद अपनी सीटें हार गए थे, हालांकि अब वो उपमुख्यमंत्री हैं।
विजयकांत 2006 में अकेले लड़कर सिर्फ 1 सीट जीत पाए थे, हालांकि वोट शेयर अच्छा था।

अब आप सोच रहे होंगे कि विजय इन सबसे अलग क्यों निकले? तो आपको बता दें उन्होंने कमल हासन की तरह सिर्फ बौद्धिक बातें नहीं कीं और न ही चिरंजीवी की तरह बीच में हिम्मत हारी। उन्होंने MGR के 'मास अपील' वाले फॉर्मूले को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा। विजय की यह जीत रातों-रात नहीं मिली है। इसके पीछे 15 साल की खामोश तैयारी थी। विजय ने अपने फैन क्लब्स को 'विजय मक्कल इयक्कम' के रूप में एक सामाजिक सेना में बदला। 85,000 फैन क्लब्स ने रक्तदान शिविर, मुफ्त ट्यूशन और बाढ़ राहत जैसे कामों के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाई। 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में विजय ने अपने समर्थकों को निर्दलीय लड़ाया और 129 सीटें जीतकर अपनी ताकत का ट्रेलर दिखा दिया था। वहीं 2024 की उस रैली में जब 8 लाख लोग जुटे, तभी समझ आ गया था कि यह भीड़ सिर्फ ऑटोग्राफ के लिए नहीं, बल्कि वोट देने के लिए तैयार खड़ी है। विजय की TVK ने सिर्फ ग्लैमर नहीं बेचा, बल्कि जनता की जेब और उनकी जरूरतों पर चोट की। उनके घोषणापत्र के इन मास्टरस्ट्रोक वादों ने महिलाओं और किसानों को अपना मुरीद बना लिया। 

महिलाओं के लिए हर महीने 2,500 रुपये की सीधी आर्थिक मदद।
गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में 8 ग्राम सोना और सिल्क की साड़ी।
विधवाओं और दिव्यांगों के लिए 3,000 रुपये का मासिक भत्ता।
200 यूनिट मुफ्त बिजली और साल में 6 मुफ्त LPG सिलेंडर।
5 एकड़ से कम जमीन वाले किसानों का फसल ऋण पूरी तरह माफ।
ग्रेजुएट्स युवाओं को 4,000 रुपये और डिप्लोमा धारकों को 2,500 रुपये का भत्ता।
हर घर तक नल से जल और एक उन्नत शिक्षा प्रणाली का वादा।
संविदा कर्मचारियों को नियमित करने का भरोसा।

जाहिर है विजय ने साफ कहा था कि "मैं एम.के. स्टालिन की तरह खोखले वादे नहीं करूँगा।" उन्होंने अपने विजन को तिरुक्कुरल' के सिद्धांतों पर आधारित बताया है। आज विजय के आवास के बाहर दिवाली जैसा माहौल है। उनके पिता एस.ए. चंद्रशेखर की आँखों में खुशी के आँसू हैं, जिन्होंने कभी विजय की पहली फिल्म का निर्देशन किया था, और आज वो अपने बेटे को तमिलनाडु की किस्मत का निर्देशन करते देख रहे हैं। वहीं तमिलनाडु ने पुराने सूरमाओं को विदा कर अपने नए नायक को चुन लिया है। विजय अब सिर्फ फिल्मों के हीरो नहीं रहे, वो तमिलनाडु की सत्ता के असली थलपति बन चुके हैं। यह जीत भारतीय राजनीति में एक मिसाल है कि अगर आपके पास ईमानदार संगठन और जनता से जुड़ा एजेंडा हो, तो आप बड़े से बड़े किलों को ढहा सकते हैं। अब विजय का दौर शुरू हो चुका है...तमिलनाडु में अब थलपति का राज होगा!

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.