“The Taj Story Review: ताजमहल के सच की पड़ताल करती परेश रावल की दमदार फिल्म, जो उठाती है इतिहास पर कई सवाल”
परेश रावल की बहुचर्चित कोर्टरूम ड्रामा फिल्म “The Taj Story” आखिरकार दर्शकों तक पहुंच गई है। यह फिल्म लंबे समय से विवादों में रही है क्योंकि यह विश्व धरोहर ताजमहल के इतिहास और उसकी वास्तविकता पर सवाल खड़े करती है। फिल्म की कहानी एक गाइड विष्णु दास (परेश रावल) की है, जो ताजमहल के इतिहास की सच्चाई जानने की कोशिश करता है। यह फिल्म दर्शकों के मन में कई ज्वलंत प्रश्न छोड़ जाती है।
फिल्म की शुरुआत 1959 के आगरा से होती है, जब ताजमहल के निचले हिस्से की मरम्मत के दौरान कुछ रहस्यमयी चीजें सामने आती हैं। इसके बाद कहानी 2023 में आती है, जहां विष्णु दास और उसका बेटा अविनाश (नमित दास) ताजमहल में गाइड का काम करते हैं। एक इंटरव्यू के दौरान जब विष्णु से ताजमहल के बंद कमरों का सच पूछा जाता है, तो वह इसे नकार देता है, लेकिन भीतर ही भीतर वह जानता है कि कोई रहस्य छिपा है। नशे की हालत में वह कह देता है कि “ताजमहल का DNA टेस्ट होना चाहिए।” यह बयान वायरल हो जाता है, और मामला अदालत तक पहुंच जाता है। विष्णु सरकार, शिक्षा विभाग और पुरातत्व विभाग के खिलाफ याचिका दायर करता है।
फिल्म के निर्देशक तुषार ने कहानी और पटकथा स्वयं लिखी है, जिसमें सौरभ एम. पांडे ने सहयोग किया है। शुरुआत में इसे काल्पनिक बताया गया है, लेकिन अंत में तुषार ने कुछ वास्तविक याचिकाओं का हवाला देकर फिल्म को आधार देने की कोशिश की है—जिनमें ताजमहल को मंदिर घोषित करने, वहां आरती करने और बंद 22 कमरों में मूर्तियों की जांच जैसी बातें शामिल हैं। इन याचिकाओं का जिक्र वास्तविक दुनिया में भी कई बार हो चुका है।
निर्देशक ने कहानी को संतुलित बनाए रखा है—फिल्म किसी एक धर्म की तरफ झुकी नहीं लगती, बल्कि ताजमहल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को भी समान रूप से पेश करती है। अदालत की जिरह और दमदार संवाद फिल्म की जान हैं। जैसे—“भारत की रग-रग में सनातन है…”, “हम नहीं चाहते कि ताजमहल को खरोच भी पहुंचे…” जैसे संवाद दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं।
फिल्म में कई गंभीर मुद्दों को उठाया गया है—जैसे इतिहास में हिंदू शूरवीरों का जिक्र कम होना, मुगलों के अत्याचार, ताजमहल के भीतर दो कब्रें होने की वजह, और तहखाने के 22 बंद कमरों का रहस्य। हालांकि, फिल्म इनमें से किसी सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं देती, बल्कि दर्शक को सोचने की गुंजाइश छोड़ती है।
तकनीकी पक्ष से फिल्म मजबूत है। हिमांशु एम. तिवारी का संपादन चुस्त है, जबकि सत्यजीत हाजर्निस की सिनेमैटोग्राफी दर्शकों को आगरा के माहौल में ले जाती है।
अभिनय की बात करें तो परेश रावल अपने किरदार में पूरी तरह डूबे नजर आते हैं। कोर्टरूम सीन में उनका आत्मविश्वास और परिवार को लेकर उनका डर—दोनों को उन्होंने बखूबी निभाया है। जाकिर हुसैन प्रतिपक्षी वकील के रूप में शानदार हैं, जबकि नमित दास, स्नेहा वाघ और श्रीकांत वर्मा ने अपनी भूमिकाओं में अच्छा काम किया है।
कुल मिलाकर, “The Taj Story” एक ऐसी फिल्म है जो इतिहास, आस्था और सच्चाई के बीच चल रही बहस को सिनेमा के माध्यम से दर्शाती है। यह फिल्म दर्शकों को न सिर्फ सोचने पर मजबूर करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि हर विवाद का समाधान तोड़ने या मिटाने में नहीं, बल्कि समझने में है।

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