नीला आसमां हो गया धूमिल-सा बेनूर और उदास,

आधुनिक हथियार न सिर्फ पशु पक्षियों के लिए अपितु मानवजाति के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है .पिछले साल रूस और युक्रेन की युद्ध में अधुनिक हथियार के चलते लोग ऐसे मौत की नींद सो रहे थे जैसे कि खिलौना हो कोई .ठीक उसी तरह अब फलिस्तीन और इजरायल के युद्ध में हो रहा है .इन्ही विषयों पर आधारित मेरी यह एक रचना जो बताने का प्रयास कर रही है कि युद्ध के चलते क्या हालत हुई है दुनिया की .


नीला आसमां हो गया धूमिल-सा
बेनूर और उदास, 
स्वच्छ चाँदनी का नहीं दूर तक 
कोई नामों निशान।
रात में तारों की मौजूदगी के 
बचें नहीं कोई निशाना।
आग उगल रहा अम्बर,धरती रो रही आज।
सूर्योदय से पूर्व नहीं रहा
उषा की चुनरी का चम्पई आलोक।
फीकी पड़ रही रोशनी सूर्य की
धमाकों की आग के आगे आज।
नज़र नहीं आ रहा उड़ता हुआ 
आसमां में पक्षी कोई, 
नहीं आ रही पक्षियों की 
चहकने की आवाज़।
सिर्फ़ नज़र आ रहा है काल बनकर
उड़ता हुआ लड़ाकू विमान।
पहाड़ों की नोकों पर 
चमकीली बर्फ़ की परतें न रहीं
बर्फ़ की आहों का घुट-घुटा धुआं
भी नज़र नहीं आ रहा आज।
सिर्फ़ नज़र आ रहा है, 
काले धुएं का गुब्बार।
आसमां की छाती में सुराख़ कर, 
मिसाइलें ले रही मासूमों की जान।
धमाकों की गूँज में दब रही, 
हमेशा के लिए लोगों की आवाज़ ।
चीख़ रही इंसानियत,
मानवता हो रही तार तार।
यह सब देख ठहाके मार कर 
हँस रहा है स्वार्थ।

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