यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते.....

हिंदी कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान अपनी देश भक्ति रचनाओं के लिए लोगों के दिलों में आज भी जिन्दा है .कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रची गई रचनाएँ आज भी लोगों के बीच काफी पंसद की जाती है. चौहान की रचनाओं में करूण के साथ देश भक्ति का जो भाव समाहित होता है वह बहुत ही खूबसूरत और लोगों के हृदयतल को स्पर्श करने वाला है।उनके द्वारा लिखी गई रचनाएँ सिर्फ कागजों में सिमित नहीं रहीं बल्कि लोगों के अंदर देश भक्ति का भाव भरने के लिए एक स्रोत बन चुकी हैं. और यही कारण है कि सुभद्रा कुमारी चौहान सबसे अधिक साहसी कवियत्री के रूप में जाना जाता है इसका प्रमाण है कि सुभद्रा कुमारी चौहान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली प्रथम महिला थीं और कई बार जेल भी जा चुकी हैं।आज हम आपके समक्ष सुभद्रा कुमारी चौहान की एक ऐसी कविता पेश कर रहें हैं जो उन्होंने जलियाँवाला हत्याकांड पर लिखी है, इसमें उन्होंने ने जलियाँवाला बाग़ में बसंत के बारे में बताया है ...पढ़िए पूरी रचना .....
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
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