होली को और भी रंगीन बना रहीं ये कवितायें

 

होली हिन्दू धर्म का एक ऐसा पर्व है जो दुश्मनों को भी गले लगाने के लिए लोगों को मजबूर कर देता है,होली पर सभी लोग सारी कड़वाहट को होलिका में दहन कर एक दूसरे को प्यार से गले लगाते हैं. इस दिन हर तरफ रंग ही रंग उड़ता हुआ नजर आता है ,साथ ही जमकर हंसी ठिठोली भी होती है. उम्रदराज लोगों पर भी होली का खुमार  कुछ इस तरह से चढ़ता है कि वे भी खुद को जवान महसूस करते हैं.लेकिन बरसाना में खेली जाने वाली फूलों की होली तो बात ही कुछ और है.आइये जानते है कि रंगों से भरे इस खुबसूरत त्यौहार पर कवियों ने क्या कुछ लिखा है .और इसे और भी रंगीन बनाने का प्रयास किया है .

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फूलों ने होली फूलों से खेली
लाल गुलाबी पीत-परागी
रंगों की रंगरेली पेली
काम्य कपोली कुंज किलोली
अंगों की अठखेली ठेली
मत्त मतंगी मोद मृदंगी
प्राकृत कंठ कुलेली रेली

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तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है। 
देखी मैंने बहुत दिनों तक दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी मेरी चादर झीनी,
 तन के तार छूए बहुतों ने मन का तार न भीगा,
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आंगन में सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है।

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