फाल्गुन मास को और भी रंगीन बनाती ये खुबसूरत रचना

फाल्गुन का माह आते ही हर किसी के जुबां पर फाल्गुन के गीत चढ़ने लगते हैं .फागुनी बयार में फागुनी गीत फाल्गुन माह में चार चाँद लगा देते हैं .फागुन का महीना आते ही सारा वातावरण रंगीन हो जाता है .ऐसा प्रतीत होता हैं जैसे प्रकृति स्वयं इस माह के इस माह के स्वागत में हर चीज को रंगीन कर देती है.और करे भी क्यों न, इस महीने में रंगों के त्योहार 'होली' हो मनाया जाता है। होली पीली चूनर ओढ़े प्रकृति और जाति भेद, ऊँचनीच, अमीरी-गरीबी से ऊपर उठकर मित्रता और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है.जिसका खुमार फागुन महीने के प्रथम दिन से ही सभी पर चढ़ने लगता है . फागुन के इस महीने को और भी रंगीन बना रही है ये प्यारी सी रचना ...
कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत,
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।
रोमरोम केसर घुली, चंदन महके अंग,
कब जाने कब धो गया, फागुन सारे रंग।
रचा महोत्सव पीत का, फागुन खेले फाग,
साँसों में कस्तूरियाँ, बोये मीठी आग।
पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप,
रह रहकर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।
मन टेसू टेसू हुआ तन ये हुआ गुलाल
अंखियों, अंखियों बो गया, फागुन कई सवाल।
होठोंहोठों चुप्पियाँ, आँखों, आँखों बात,
गुलमोहर के ख्वाब में, सड़क हँसी कल रात।
अनायास टूटे सभी, संयम के प्रतिबन्ध,
फागुन लिखे कपोल पर, रस से भीदे छंद।
अंखियों से जादू करे, नजरों मारे मूंठ,
गुदना गोदे प्रीत के, बोले सौ सौ झूठ।
पारा, पारस, पद्मिनी, पानी, पीर, पलाश,
प्रंय, प्रकर, पीताभ के, अपने हैं इतिहास।
भूली, बिसरी याद के, कच्चे पक्के रंग,
देर तलक गाते रहे, कुछ फागुन के संग।
-दिनेश शुक्ल
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