है यह पतझड़ की शाम, सखे

परिवर्तन प्रकृति का नियम है ,इसी नियमानुसार प्रकृति में परिवर्तन होता रहता है . कभी वंसत रंगबिरंगे फूलों से प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार करता है तो कभी बरखा रानी काली घटाएं बिछाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर देती हैं , इसी तरह एक ऋतू ऐसा भी आती है जिसके बिना नये सृजन का आरंभ ही नहीं हो सकता है . हम बात कर रहें है पतझड़ की. जिसके आने पर पेड़ों में लगे पूरने पत्ते झड़ने लगते हैं . पेड़ों में एक भी पत्ते नही रह जाते हैं . किन्तु एक नई शुरुआत के लिए पुरानी चीजों का अंत होना अनिवार्य होता है . वैसे तो पतझड़ पर बहुत से कवियों और लेखकों में बहुत कुछ कहा है लेकिन कवि हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी रचना पतझड़ की शाम के मध्याम से जो बाते कहीं है वो सीधे हृदयतल को स्पर्श कर रही है ...एक आप भी इस रचना को पढ़कर पतझड़ की शाम को एक अलग अहसास के साथ महसूस की जिए ....
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
नीलम से पल्लव टूट गए,
मरकत से साथी छूट गए,
अटके फिर भी दो पीत पात,
जीवन-डाली को थाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
लुक-छिप करके गानेवाली,
मानव से शरमानेवाली,
कू-कू कर कोयल माँग रही,
नूतन घूँघट अविराम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
नंगी डालों पर नीड़ सघन,
नीड़ों में है कुछ-कुछ कंपन,
मत देख, नज़र लग जाएगी;
यह चिड़ियों के सुखधाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!
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