‘टॉक्सिक’ फिल्म रिव्यू: यश की फिल्म में एक्शन से लेकर स्टारकास्ट तक, जानें कैसा है पूरा अनुभव
BY- ARSHITA SINGH
साउथ सुपरस्टार यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स’ आखिरकार 26 अगस्त को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म को लेकर लंबे समय से दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्साह बना हुआ था। कई बार रिलीज डेट में बदलाव के बाद अब यह फिल्म कन्नड़ और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी, तमिल और तेलुगू भाषाओं में भी दर्शकों के सामने है।
फिल्म में यश के साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत अहम भूमिकाओं में नजर आ रही हैं। फिल्म का निर्देशन चर्चित फिल्ममेकर गीतू मोहनदास ने किया है। ‘टॉक्सिक’ को एक्शन, गैंगवार, ड्रामा और रिश्तों की जटिलताओं से जोड़कर पेश करने की कोशिश की गई है।
क्या है ‘टॉक्सिक’ की कहानी?

फिल्म की शुरुआत कियारा आडवाणी के किरदार और उसके बेटे से होती है। शुरुआत से ही कहानी में एक रहस्यमय और खतरनाक माहौल बनाने की कोशिश की गई है। इसके बाद कहानी 1947 के दौर में पहुंचती है, जहां गोवा की गैंगवार और अपराध की दुनिया दिखाई जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में नयनतारा की दमदार एंट्री होती है। वह फिल्म में राया यानी यश की बहन की भूमिका निभा रही हैं। इसके बाद यश की एंट्री होती है और उनके किरदार को एक्शन से भरपूर अंदाज में पेश किया जाता है।
राया की जिंदगी उसके परिवार, पुराने दुश्मनों और बदले की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में यश के किरदार के सामने कई चुनौतियां हैं और वह अपने अतीत से जुड़े हिसाब-किताब को पूरा करने की कोशिश करता है। कहानी में गैंगवार के साथ पारिवारिक रिश्तों और बदले की भावना को भी प्रमुखता दी गई है।
हालांकि, फिल्म की कहानी कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस होती है। शुरुआत में एक्शन जरूर देखने को मिलता है, लेकिन कहानी को आगे बढ़ाने में फिल्म की रफ्तार कई बार कमजोर पड़ जाती है।
‘टॉक्सिक’ का पहला हाफ फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक नजर आता है। कहानी को स्थापित करने में काफी समय लिया गया है और कई हिस्सों में फिल्म की गति बेहद धीमी महसूस होती है।
गैंगवार और बदले की कहानी में ऐसा कुछ खास नया नहीं दिखाई देता, जो दर्शकों को लगातार बांधे रखे। कई घटनाएं पहले देखी हुई फिल्मों की याद दिलाती हैं। फिल्म का लंबा रनटाइम भी कहानी की धीमी गति को और ज्यादा महसूस कराता है।
यश की स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत है और उनके एक्शन सीक्वेंस फिल्म की खासियत हैं, लेकिन सिर्फ एक्शन के सहारे कहानी को लंबे समय तक रोचक बनाए रखना मुश्किल साबित होता है।
कियारा और तारा के किरदार कितने प्रभावी?
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कियारा आडवाणी फिल्म में एक अलग अंदाज में दिखाई देती हैं। उनका किरदार सर्कस की दुनिया से जुड़ा हुआ है और उसके लिए एक अलग बैकस्टोरी तैयार की गई है। हालांकि, कहानी में उनका इस्तेमाल उतना प्रभावी नहीं लगता, जितनी उम्मीद की जा सकती थी।
यश और कियारा के बीच रोमांटिक एंगल भी कहानी में मौजूद है, लेकिन यह हिस्सा कई जगह अनावश्यक रूप से खिंचा हुआ महसूस होता है। दोनों के बीच की केमिस्ट्री को ज्यादा प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था।
तारा सुतारिया का किरदार भी कहानी में ज्यादा मजबूत प्रभाव नहीं छोड़ पाता। उनके और यश के बीच दिखाया गया एंगल कहानी के बाकी हिस्सों के मुकाबले कुछ हद तक असंगत लगता है। दोनों अभिनेत्रियों के पास प्रतिभा होने के बावजूद उनके किरदारों को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।
नयनतारा बनीं फिल्म की अहम कड़ी

नयनतारा का किरदार फिल्म में यश की बहन का है और उनकी एंट्री दर्शकों का ध्यान खींचती है। वह अपने किरदार में आत्मविश्वास और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस लेकर आती हैं।
यश और नयनतारा के बीच भाई-बहन का रिश्ता फिल्म की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों के किरदारों के जरिए पारिवारिक भावनाओं को गैंगवार और बदले की कहानी से जोड़ने की कोशिश की गई है।
यश का एक्शन और स्क्रीन प्रेजेंस

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यश हैं। उनकी एंट्री से लेकर एक्शन सीक्वेंस तक उन्हें बड़े पैमाने पर पेश किया गया है। यश का स्वैग और स्क्रीन प्रेजेंस उनके प्रशंसकों को पसंद आ सकता है।
एक्शन दृश्यों को भव्य बनाने की कोशिश की गई है और कई सीक्वेंस सिनेमाघर में दर्शकों को उत्साहित कर सकते हैं। हालांकि, फिल्म की कहानी अगर थोड़ी ज्यादा चुस्त होती तो इन एक्शन दृश्यों का प्रभाव और बढ़ सकता था।
निर्देशन और कहानी में क्या कमी रही?
गीतू मोहनदास ने फिल्म को एक अलग और डार्क टोन देने की कोशिश की है। विजुअल्स और फिल्म का माहौल कई जगह प्रभावशाली दिखाई देता है। लेकिन कहानी को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें गति की कमी साफ महसूस होती है।
फिल्म में कई किरदार और ट्रैक एक साथ चलाए गए हैं। इन सभी को जोड़ने की कोशिश में मुख्य कहानी की पकड़ कुछ जगह कमजोर पड़ जाती है। खासकर पहले हाफ में स्क्रीनप्ले को ज्यादा कसावट की जरूरत महसूस होती है।
कुल मिलाकर कैसी है ‘टॉक्सिक’?
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‘टॉक्सिक: ए फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स’ एक बड़े स्टार, बड़े बजट और बड़े पैमाने पर तैयार की गई एक्शन फिल्म है। यश के प्रशंसकों के लिए इसमें कई ऐसे पल हैं, जिनका सिनेमाघर में आनंद लिया जा सकता है। उनका एक्शन, स्वैग और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, कमजोर और धीमी कहानी, लंबा रनटाइम और कुछ ऐसे किरदार जिन्हें अपेक्षित गहराई नहीं मिल पाती, फिल्म के अनुभव को प्रभावित करते हैं। कियारा और तारा के किरदारों का बेहतर इस्तेमाल किया जाता तो फिल्म और मजबूत हो सकती थी।
निष्कर्ष: अगर आप यश के बड़े फैन हैं और बड़े पर्दे पर एक्शन व स्टारडम देखना पसंद करते हैं, तो ‘टॉक्सिक’ आपको आकर्षित कर सकती है। लेकिन अगर आपकी प्राथमिकता मजबूत कहानी और तेज स्क्रीनप्ले है, तो फिल्म का पहला हाफ आपको थोड़ा निराश कर सकता है।
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