'ऐसी नीति बने जिससे देश का हर युवा संतुष्ट महसूस करे': UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट और दोटूक शब्दों में कहा कि सरकार की नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे देश का प्रत्येक युवा संतुष्ट महसूस करे और किसी भी वर्ग के भीतर असंतोष का भाव पैदा न हो। सर्वोच्च न्यायालय के इस रुख के बीच केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इस पूरे मामले पर नए सिरे से विचार कर रही है और छात्रों की तमाम चिंताओं के समाधान के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया जा सकता है।

चार सप्ताह के लिए टली सुनवाई, 2012 के नियम रहेंगे लागू

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है। अदालत ने पूर्व में दिए गए आदेश को बरकरार रखते हुए यह साफ किया कि जब तक नए नियमों की समीक्षा की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती और कोर्ट इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाता, तब तक 2012 में लागू किए गए पुराने यूजीसी नियम ही उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रभावी रहेंगे।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार इस मामले की गहन समीक्षा कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी वर्गों के छात्रों की व्यावहारिक और कानूनी चिंताओं का समुचित निवारण हो और किसी भी समुदाय के छात्रों के मन में किसी तरह की असुरक्षा या असंतोष न रहे।

रोहित वेमुला और पायल तडवी के मामलों से जुड़ी हैं याचिकाएं

यह पूरा मामला 'अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ' और उससे जुड़ी अन्य संबंधित याचिकाओं से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि वर्ष 2019 में देश के प्रतिष्ठित परिसरों में कथित तौर पर जातिगत भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या करने वाले दो होनहार छात्रों—रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ताओं ने देश भर के उच्च शिक्षण संस्थानों में हाशिए पर मौजूद वर्गों के छात्रों के खिलाफ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए कड़े और प्रभावी सुरक्षात्मक उपाय लागू करने की गुहार लगाई थी। इसी याचिका के संदर्भ में व्यापक विचार-विमर्श के बाद नए नियम अधिसूचित किए गए थे, जिन पर बाद में कानूनी और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया।

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