39 पत्नियां, 94 बच्चे और 100 कमरे… ऐसा है भारत का सबसे बड़ा परिवार

आज के दौर में जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं और बेहतर शिक्षा, नौकरी या सुविधाओं के लिए लोग अपने घरों से दूर जाकर बस रहे हैं, वहीं मिजोरम का बक्तावंग गांव एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। यहां कभी एक ऐसा परिवार रहा, जिसकी विशालता ने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।
 
इस परिवार के मुखिया रहे जियोना चाना। परिवार में उनकी 39 पत्नियां, 94 बच्चे, 14 बहुएं और 33 पोते-पोतियां समेत बड़ी संख्या में अन्य सदस्य शामिल थे। कुल सदस्यों की संख्या करीब 200 तक बताई जाती रही है। इतने बड़े परिवार का एक ही परिसर में रहना अपने आप में बेहद असामान्य था।
 
कहानी की जड़ें एक धार्मिक समुदाय से जुड़ी हैं
 
इस परिवार की कहानी को समझने के लिए इसके धार्मिक समुदाय के इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 1942 में खुआंगतुआहा ने ‘लालपा कोहरान थार’ नामक धार्मिक समुदाय की स्थापना की थी। बाद में जियोना चाना इस समुदाय के प्रमुख बने।
 
1997 में अपने पिता के निधन के बाद जियोना चाना ने समुदाय की जिम्मेदारी संभाली। उनके नेतृत्व में समुदाय के साथ उनका परिवार भी लगातार बढ़ता गया। जियोना चाना का निधन 13 जून 2021 को 75 वर्ष की उम्र में हुआ था।
 
100 कमरों का घर बना परिवार की पहचान
 
बक्तावंग गांव में स्थित इस परिवार का विशाल मकान इसकी सबसे खास पहचान रहा है। ‘चुआन थार रन’ नाम से जाना जाने वाला यह बहुमंजिला भवन करीब 100 कमरों वाला बताया जाता है।
 
बाहर से देखने पर यह किसी बड़े हॉस्टल या संस्थान जैसा दिखाई देता है। इतने विशाल घर की जरूरत भी परिवार के आकार के कारण ही पैदा हुई थी। घर में परिवार के सदस्यों के साथ-साथ मेहमानों के लिए भी अलग व्यवस्था की गई थी।
 
परिवार के भीतर रहने की व्यवस्था भी तय तरीके से की जाती थी। अलग-अलग उम्र और समूह के सदस्यों के लिए घर के विभिन्न हिस्सों में कमरे निर्धारित थे। इतने बड़े परिवार को एक छत के नीचे व्यवस्थित रखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी।
 
एक परिवार की रसोई में रोज तैयार होता था सैकड़ों लोगों का खाना
 
इतने सदस्यों वाले परिवार में भोजन की व्यवस्था किसी सामुदायिक रसोई से कम नहीं थी। बड़े बर्तनों और सामूहिक मेहनत के जरिए खाना तैयार किया जाता था।
 
परिवार के सदस्यों के बीच काम भी बांटे गए थे। महिलाएं रसोई और घरेलू जिम्मेदारियों में योगदान देती थीं, जबकि परिवार के कई पुरुष खेती, पशुपालन, बढ़ईगिरी और दूसरे कामों से जुड़े हुए थे।
 
इस तरह घर सिर्फ रहने की जगह नहीं था, बल्कि अपने आप में एक छोटी सामुदायिक व्यवस्था जैसा काम करता था।
 
परिवार ने अपनी जरूरतों के लिए खड़ी की अलग व्यवस्था
 
इस परिवार की खासियत सिर्फ इसकी संख्या नहीं थी। परिवार के सदस्य खेती और पशुपालन जैसी गतिविधियों में भी शामिल थे। फर्नीचर बनाने और एल्युमिनियम से जुड़े कामों का भी उल्लेख मिलता है।
 
जियोना चाना ने बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल की व्यवस्था भी की थी। वहां सामान्य शिक्षा के साथ समुदाय से जुड़े विषयों को भी जगह दी गई थी।
 
यानी इतने बड़े परिवार ने रोजमर्रा की कई जरूरतों को अपने स्तर पर पूरा करने की कोशिश की थी। इसी वजह से यह परिवार लंबे समय तक मीडिया और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा।
 
रिकॉर्ड बनाने की चर्चा के बावजूद परिवार ने नहीं कराया आधिकारिक सत्यापन
 
जियोना चाना के परिवार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चर्चा हुई। विभिन्न मीडिया संस्थानों और रिकॉर्ड से जुड़ी संस्थाओं ने इसे दुनिया के सबसे बड़े परिवारों में गिना।
 
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि 2011 में Guinness World Records की ओर से परिवार के आकार के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई थी। हालांकि, परिवार की ओर से कथित तौर पर इसमें आगे नहीं बढ़ा गया।
 
इसी कारण इस परिवार को लेकर ‘दुनिया का सबसे बड़ा परिवार’ जैसे दावे अलग-अलग स्रोतों में अलग तरीके से सामने आते रहे हैं। इसलिए इसे आधिकारिक Guinness रिकॉर्ड के रूप में पेश करने से पहले स्रोत की पुष्टि करना जरूरी है।
 
जियोना चाना के निधन के बाद भी कायम है परिवार की पहचान
 
13 जून 2021 को जियोना चाना के निधन के बाद भी उनके परिवार और बक्तावंग स्थित उनके विशाल घर की चर्चा खत्म नहीं हुई। उनका घर आज भी इस असाधारण पारिवारिक व्यवस्था की पहचान के तौर पर जाना जाता है।
 
यह कहानी सिर्फ एक बड़े परिवार की संख्या तक सीमित नहीं है। यह उस सामुदायिक जीवन की झलक भी देती है, जहां सैकड़ों लोग एक ही व्यवस्था का हिस्सा बनकर रहते थे।
 
बक्तावंग का यह परिवार इसलिए भी लोगों की दिलचस्पी का विषय बना रहा क्योंकि आधुनिक समय में जहां संयुक्त परिवारों का आकार लगातार छोटा हो रहा है, वहीं यहां लंबे समय तक एक बेहद बड़ा परिवार एक साथ रहने के लिए जाना जाता रहा।

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