बापू भवन से विधान भवन तक... जानिए किस मंत्री को मिला कौन सा कमरा और किसका घटा रसूख?
लखनऊ के गलियारों से लेकर दिल्ली के दरबार तक जिस बात का सस्पेंस पिछले एक हफ्ते से बना हुआ था, उस पर आखिरकार रविवार को विराम लग गया है। 10 मई को जब योगी सरकार का कैबिनेट विस्तार हुआ, तो हर तरफ अटकलों का बाजार गर्म था। कोई कह रहा था कि मुख्यमंत्री के अपने पर कतरे जाएंगे, तो कोई कह रहा था कि इस बार विभागों का फैसला लखनऊ से नहीं बल्कि दिल्ली के इशारे पर होगा। लेकिन रविवार 17 मई को जब विभागों की लिस्ट सामने आई, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक झटके में विरोधियों के सारे कयासों को धुआं-धुआं कर दिया और साफ कर दिया कि यूपी में बॉस सिर्फ और सिर्फ वही हैं। न तो वो किसी दबाव में आते हैं और न ही किसी के इशारे पर चलते हैं।
दरअसल, मंत्रिमंडल विस्तार के ठीक बाद मुख्यमंत्री का दिल्ली जाकर अमित शाह और जेपी नड्डा से मिलना राजनीतिक पंडितों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ था। कहा जा रहा था कि विभागों की पर्ची दिल्ली से कटकर आएगी, लेकिन जब विभागों का बंटवारा हुआ तो पूरी तस्वीर ही बदल गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे 7 दिनों तक गहरी सियासी और प्रशासनिक बिसात बिछाई और फिर जो पत्ता खोला, उससे कई दिग्गजों के सियासी कद हिल गए, तो कई नए चेहरों की किस्मत का सितारा बुलंद हो गया। इस बंटवारे के जरिए मुख्यमंत्री ने न सिर्फ अपनी प्रशासनिक हनक दिखाई है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए ऐसी 'सोशल इंजीनियरिंग' की है जिससे विपक्षी खेमे में खलबली मच गई है। वहीं इस पूरे विभाग बंटवारे की सबसे बड़ी और धमाकेदार इनसाइड स्टोरी यह है कि सपा छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले ब्राह्मण चेहरा मनोज पांडेय ने इस सियासी रेस में बाजी मार ली है।
भाजपा उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने की पुरजोर कोशिश में जुटी थी, और यही वजह है कि मनोज पांडेय को सरकार के सबसे भारी-भरकम और सीधे जनता से जुड़े 'खाद्य एवं रसद तथा नागरिक आपूर्ति विभाग' की कमान सौंप दी गई है। इस फैसले के बाद सियासी हलकों में मनोज पांडेय का कद रातों-रात सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लेकिन मनोज पांडेय की इस चांदी के पीछे बनारस के कद्दावर नेता दयालु मिश्रा को बड़ा झटका लगा है। अब तक खाद्य एवं रसद जैसा बड़ा मंत्रालय संभाल रहे दयालु मिश्रा से यह विभाग छीनकर मनोज पांडेय की झोली में डाल दिया गया। अब दयालु मिश्र के पास सिर्फ 'आयुष विभाग' ही बचा है, जिससे यह साफ संकेत जाता है कि उनका सियासी रसूख पहले के मुकाबले कम हुआ है।
वहीं दूसरी तरफ, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और जाटों के बड़े नेता भूपेंद्र सिंह चौधरी की सरकार में धमाकेदार वापसी तो हुई है, लेकिन उन्हें उस विभाग से संतोष करना पड़ा जिसकी चर्चा हवाओं में नहीं थी। दरअसल, कयास लग रहे थे कि गृह विभाग के बाद सबसे भारी माना जाने वाला लोक निर्माण विभाग भूपेंद्र चौधरी को मिल सकता है, लेकिन उन्हें 'सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम' यानि MSME विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, MSME को कम नहीं समझना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री रोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना और UPSIC मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना जैसी सीधे पीएम और सीएम की निगरानी वाली बड़ी योजनाएं इसी मंत्रालय के अधीन आती हैं। इस लिहाज से भूपेंद्र चौधरी को जनता के बीच सीधे पकड़ बनाने का एक बेहतरीन और महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म मिला है। आपको बता दें भूपेंद्र चौधरी को MSME मिलने से योगी सरकार के एक और मंत्री राकेश सचान को तगड़ा झटका लगा है। 2022 के चुनाव से ठीक पहले सपा छोड़कर आए राकेश सचान के पास अब तक MSME के साथ-साथ खादी एवं ग्रामोद्योग, रेशम उद्योग और हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग जैसे विभागों का पूरा साम्राज्य था। लेकिन अब मुख्यमंत्री ने उनसे MSME का भारी-भरकम प्रभार छीनकर भूपेंद्र चौधरी को दे दिया है। राकेश सचान के पास अब सिर्फ खादी और रेशम उद्योग ही बचा है, जिसे राजनीतिक पंडित उनके कद में बड़ी कटौती के रूप में देख रहे हैं।
वहीं योगी कैबिनेट में जिन दो मंत्रियों का प्रमोशन हुआ, उनकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। गुर्जर चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले सोमेंद्र तोमर को राज्यमंत्री से प्रमोट करके स्वतंत्र प्रभार का मंत्री तो बना दिया गया, लेकिन विभागों के मामले में उनके साथ एक अजीब सा खेल हो गया। जब वह राज्यमंत्री थे, तब उनके पास 'ऊर्जा' जैसा बेहद रसूखदार और बड़ा विभाग था, लेकिन स्वतंत्र प्रभार मिलते ही उन्हें 'राजनैतिक पेंशन, सैनिक कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल' जैसी शांत प्रोफाइल वाला विभाग थमा दिया गया। इसे राजनीति में 'ऊंचा पद, कम पावर' की रणनीति कहा जा रहा है। वहीं दूसरे प्रमोटेड नेता अजीत सिंह पाल को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाते हुए 'खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन' विभाग का जिम्मा सौंपा गया है, जो एक महत्वपूर्ण और सीधा एक्शन वाला विभाग माना जाता है। अब बात करते हैं सरकार के नए राज्यमंत्रियों की, जिन्हें 2027 के महामुकाबले को ध्यान में रखकर जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए टीम योगी में एंट्री दी गई है।
दलित समाज से आने वालीं कृष्णा पासवान को 'पशुधन एवं दुग्ध विकास' विभाग में राज्यमंत्री बनाया गया है।
कैलाश सिंह राजपूत को 'ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत' विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सुरेंद्र दिलेर को सरकार के बेहद महत्वपूर्ण और जमीनी जुड़ाव वाले 'राजस्व विभाग' में राज्यमंत्री की कुर्सी मिली है।
हंसराज विश्वकर्मा को भूपेंद्र सिंह चौधरी के साथ MSME विभाग में सहायक भूमिका के रूप में राज्यमंत्री का जिम्मा दिया गया है।
वहीं इसी बीच अंदरखाने से आई जानकारी के मुताबिक दफ्तरों का बंटवारा कुछ इस तरह हुआ है:
कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी: इन्हें विधान भवन की मुख्य इमारत में ही 'कक्ष संख्या 82बी' आवंटित किया गया है।
कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय: इन्हें बापू भवन की ऊंची इमारत के आठवें तल पर आलीशान कार्यालय मिला है।
राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अजीत सिंह पाल: इन्हें बापू भवन के तीसरे तल पर कमरा अलॉट हुआ है।
राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सोमेंद्र तोमर: इन्हें बापू भवन के चौथे तल पर दफ्तर दिया गया है।
राज्यमंत्री कृष्णा पासवान: इन्हें सचिवालय में कक्ष संख्या 'F-34' की जिम्मेदारी मिली है।
राज्यमंत्री सुरेंद्र दिलेर: इन्हें बापू भवन के छठे तल पर ऑफिस आवंटित हुआ है।
राज्यमंत्री हंसराज विश्वकर्मा: इन्हें बापू भवन के तीसरे तल पर कमरा मिला है।
वहीं विभागों के इस धमाकेदार बंटवारे के तुरंत बाद, उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज सोमवार 18 मई का दिन बेहद ऐतिहासिक और गहमागहमी भरा रहा। जी हां आज सोमवार सुबह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में पहली मंत्री परिषद की हाई-प्रोफाइल बैठक आयोजित हुई। यह बैठक पूरे एक घंटे तक चली। इस बैठक में कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ सभी नए नवेले मंत्री भी शामिल हुए। चूंकि रविवार को ही विभागों का आधिकारिक तौर पर बंटवारा हो चुका था, इसलिए सभी मंत्री सोमवार को हुई इस पहली बैठक में पूरी तैयारी और अपने-अपने विभागों के शुरुआती रोडमैप के साथ पहुंचे थे। इस बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल नए मंत्रियों का स्वागत किया, बल्कि उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी पंचायत चुनाव की सबसे बड़ी बाधा को दूर करने के लिए एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक दांव चल दिया है! आपको बता दें योगी कैबिनेट की इस बैठक में समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को हरी झंडी दे दी गई है। सरकार के इस एक फैसले ने यूपी पंचायत चुनाव की राह में खड़ी सबसे बड़ी कानूनी अड़चन को जड़ से खत्म कर दिया है।
दरअसल, यूपी में ओबीसी आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो गया था, जिसे योगी सरकार ने आगे बढ़ाते हुए अक्टूबर 2026 तक के लिए तो कर दिया था, लेकिन कानूनी पेंच यह था कि उसके पास 'समर्पित आयोग' के अधिकार नहीं थे। कानून के मुताबिक, ओबीसी आयोग अपने तीन साल के मूल कार्यकाल के दौरान ही आरक्षण का सर्वे कर सकता है। इसी कानूनी बाधा को देखते हुए योगी सरकार ने इस कैबिनेट बैठक के जरिए नए 'समर्पित ओबीसी आयोग' के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। ऐसे में इस आयोग के गठन के साथ ही अब राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण की प्रक्रिया बिजली की रफ्तार से शुरू हो सकेगी। अब यह नया समर्पित ओबीसी आयोग उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में पिछड़ों का एक बड़ा रैपिड सर्वे करेगा। इस रैपिड सर्वे के जरिए ही यूपी में पिछड़ों की वास्तविक और सटीक आबादी का पता लगाया जाएगा और उसी आबादी के आंकड़ों के अनुसार सीटों का नया आरक्षण पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया के पूरे होते ही उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का बिगुल फूंक दिया जाएगा।
देखा जाए तो इस पूरे सियासी ड्रामे, विभागों के बंटवारे और कैबिनेट के फैसलों से एक बात बिल्कुल आईने की तरह साफ हो चुकी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल अपनी राजनीतिक काबिलियत को साबित किया है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए एक अचूक चक्रव्यूह भी रच दिया है। जाट सियासत को साधने के लिए भूपेंद्र चौधरी को आगे करना, RLD के साथ गठबंधन के बीच एक मजबूत लकीर खींचना, ब्राह्मणों को रीझाने के लिए मनोज पांडेय को भारी विभाग सौंपना और कैबिनेट की पहली ही बैठक में समर्पित ओबीसी आयोग का गठन कर पिछड़ों को लामबंद करना, यह सब यूपी फतह करने का वो मास्टरस्ट्रोक है जिसके आगे फिलहाल विपक्ष पूरी तरह निशब्द नजर आ रहा है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि ये नए नवेले और प्रमोट हुए वजीर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस भरोसे और चुनावी महाबिसात पर कितने खरे उतरते हैं!

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