यूपी में सत्ता की हैट्रिक के लिए बीजेपी का महा-प्लान, रूठों को मनाने की कवायद तेज!

उत्तर प्रदेश की सियासत में इस वक्त गजब का उबाल है! भले ही 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त हो, लेकिन लखनऊ के कालिदास मार्ग से लेकर दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग तक राजनीतिक गोटियां इतनी तेजी से बिछाई जा रही हैं कि अच्छे-अच्छे राजनीतिक पंडितों का सिर घूम जाए। जी हां लोकसभा चुनाव 2024 में लगे करारे झटके के बाद भारतीय जनता पार्टी अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। एक तरफ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने 'पीडीए' फॉर्मूले की तान छेड़े हुए हैं, तो दूसरी तरफ सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के रणनीतिकार सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए हर उस कील-कांटे को दुरुस्त करने में जुट गए हैं, जो जरा भी ढीली नजर आ रही है। दरअसल, यूपी की राजनीति का एक नियम है कि यहाँ विकास के दावों की चमक चाहे जितनी तेज हो, अंदरूनी परत हमेशा जातिगत समीकरणों की चाशनी में ही डूबकर तैयार होती है। इस बार लड़ाई आर-पार की है। बीजेपी अपने कोर वोट बैंक यानी 'ब्राह्मणों और राजपूतों' को किसी भी कीमत पर छिटकने नहीं देना चाहती, क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि अगर घर का ये मजबूत स्तंभ ढहा, तो 2027 का किला बचाना नामुमकिन हो जाएगा। यही वजह है कि रूठों को मनाने, अपनों को सहलाने और विरोधियों को चौंकाने का एक ऐसा तड़कता-भड़कता खेल शुरू हो चुका है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है!

जाहिर है यूपी की सियासत में ब्राह्मणों का रुख हमेशा से सत्ता का रुख तय करता आया है। हाल ही में 10 मई को योगी सरकार के कैबिनेट विस्तार ने इस बात पर मुहर लगा दी कि बीजेपी इस वर्ग को लेकर कितनी गंभीर है। 6 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली, लेकिन सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं मनोज पांडेय ने। वही मनोज पांडेय, जो समाजवादी पार्टी के मुख्य सचेतक हुआ करते थे और पाला बदलकर बीजेपी में आए। उन्हें सीधा खाद्य, रसद और नागरिक आपूर्ति जैसा भारी-भरकम विभाग सौंप दिया गया। मनोज पांडेय का मंत्री बनना विपक्ष के उस नैरेटिव को ध्वस्त करने की कोशिश थी, जिसमें आरोप लगाया जा रहा था कि योगी सरकार में ब्राह्मणों को सम्मान नहीं मिल रहा। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसने बीजेपी के भीतर ही एक नई बहस को जन्म दे दिया है। चर्चा आम हो चुकी है कि यूपी बीजेपी में बाहरी ब्राह्मण नेताओं की तो चांदी है, लेकिन जो सालों से दरी बिछा रहे हैं, वो साइडलाइन हैं! ऐसे में आइए जरा उन चेहरों पर भी नजर डाल लेते हैं।  

ब्रजेश पाठक: बसपा से आए और आज सूबे के उपमुख्यमंत्री हैं, यानी सरकार में नंबर दो की हैसियत।

जितिन प्रसाद: कांग्रेस के कद्दावर नेता थे, बीजेपी में आए, योगी सरकार में भारी-भरकम मंत्रालय संभाला और अब पीलीभीत से सांसद 

मनोज पांडेय: सपा से आए और सीधे लाल बत्ती पा गए।

तो, ये वो नाम थे जिनके भाजपा में आते ही चांदी हो गई। अब जरा उन भाजपाइयों का हाल देखिए, जो सालों से संघ और संगठन की भट्ठी में तपकर निकले हैं। 

डॉ. दिनेश शर्मा, पूर्व डिप्टी सीएम
रीता बहुगुणा जोशी
आशुतोष टंडन
सतीश द्विवेदी
उदयभान करवरिया 
शलभमणि त्रिपाठी 

ये सभी बड़े नाम इस वक्त मुख्यधारा की बड़ी जिम्मेदारियों से दूर हैं। ये नेता या तो सोशल मीडिया की चर्चाओं तक सीमित हैं या फिर हाशिए पर संगठन के अगले आदेश का इंतजार कर रहे हैं। आपको बता दें यह नाराजगी सिर्फ दबी-छुपी नहीं थी, बल्कि पिछले साल 23 दिसंबर 2025 को यह खुलकर सामने आ गई थी। लखनऊ के VVIP इलाके में स्थित कुशीनगर के बीजेपी विधायक पंचानंद पाठक के सरकारी आवास पर एक ऐसी बैठक हुई, जिसने बीजेपी आलाकमान के कान खड़े कर दिए थे। इस खुफिया और बेहद अहम बैठक में बीजेपी के करीब 40 ब्राह्मण विधायक और विधान परिषद सदस्य जुटे थे। इसमें पूर्वांचल और बुंदेलखंड के विधायकों की तादाद सबसे ज्यादा थी। चौंकाने वाली बात यह थी कि इस बैठक में कुछ दूसरे दलों के ब्राह्मण विधायक भी अपनी बिरादरी की बात रखने पहुंच गए थे। उस बंद कमरे की बैठक में विधायकों ने साफ कहा कि पिछले कुछ समय से राजनीतिक दल, उनके नेता और यहाँ तक कि प्रशासनिक स्तर पर भी ब्राह्मण समाज को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। इस बैठक में तय हुआ कि अब समाज को अपनी ताकत का अहसास सामूहिक रूप से कराना होगा। यही वो वजह है जिसके चलते बीजेपी लीडरशिप अलर्ट मोड पर आ गई। पार्टी को समझ आ गया कि कोर वोटर घर की मुर्गी नहीं है जिसे दाल बराबर समझा जाए। इसलिए विपक्ष की नजर इस वोट बैंक पर पड़ने से पहले ही बीजेपी ने डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज कर दी।

वहीं दूसरी तरफ मंत्रिमंडल विस्तार में तो बीजेपी ने विपक्ष के 'पीडीए' फॉर्मूले की काट निकालने के लिए जमकर जातीय कार्ड खेला था। 6 नए मंत्रियों में से 3 ओबीसी, 2 दलित और 1 सवर्ण समाज से थे, जबकि दो ओबीसी मंत्रियों का प्रमोशन भी किया गया। इसके जरिए संदेश दिया गया कि पिछड़ा और वंचित वर्ग बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा है। लेकिन अब कहानी बदलने वाली है! संगठन के स्तर पर जो बदलाव होने जा रहे हैं, उसमें बीजेपी जातीय समीकरणों की बजाय संगठनात्मक अनुभव को प्राथमिकता देने की एक बेहद अनोखी और बड़ी प्लानिंग कर रही है। जी हां एक बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी की नई प्रदेश टीम में कम से कम 60 फीसदी पदाधिकारी ऐसे होने वाले हैं, जो लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं और जिन्हें संगठन चलाने का जमीनी और कड़क अनुभव है। इस बार उनकी जाति क्या है, यह मायने नहीं रखेगा, बल्कि मायने यह रखेगा कि वे संकट के समय बूथ स्तर पर पार्टी को कैसे जिता सकते हैं! ऐसे में बीजेपी प्रदेश की 45 सदस्यीय मुख्य टीम में तो भारी फेरबदल करेगी ही, साथ ही सूबे के सभी 6 संगठनात्मक क्षेत्रों, काशी, गोरखपुर, पश्चिमी यूपी, अवध, ब्रज और कानपुर-बुंदेलखंड की टीमों में भी बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाएंगे। इसके अलावा पार्टी के सातों मोर्चों के अध्यक्ष और पदाधिकारी बदले जाएंगे। यह पूरा खाका बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और प्रदेश महामंत्री धर्मपाल सिंह के बीच हुई एक बेहद लंबी और गोपनीय बैठक में तैयार किया गया है। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई है कि चुनाव जीतने के लिए जाति से ज्यादा जरूरी वफादार और अनुभवी सिपाही हैं।

वहीं इस महा-बदलाव के बीच यूपी के राजनीतिक गलियारों में एक बहुत बड़ा सस्पेंस गहरा गया है। कयासों का बाजार गर्म है कि बीजेपी पहले अपनी प्रदेश इकाई के पदाधिकारियों के नामों का ऐलान करेगी या फिर उत्तर प्रदेश के विभिन्न आयोगों, निगमों, बोर्डों और प्राधिकरणों में सालों से खाली पड़े मलाईदार पदों को भरेगी? कुल मिलाकर 2027 की यह जंग सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की भावी राजनीति की दिशा तय करने वाला महासंग्राम है। एक तरफ समाजवादी पार्टी अपने जातिगत गठजोड़ और बीजेपी सरकार की कथित उपेक्षा के मुद्दों को लेकर आक्रामक है, तो दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी अपने जख्मों को सहलाते हुए एक अभेद्य किला तैयार कर रही है। फिलहाल दिल्ली में बंद लिफाफे के खुलने का इंतजार है। जैसे ही वो लिस्ट बाहर आएगी, यूपी की सियासत में एक नया भूचाल आना तय है। नजरें जमाए रखिए, क्योंकि यूपी का यह दंगल अब और भी ज्यादा दिलचस्प और हाई-वोल्टेज होने जा रहा है! 

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