आंबेडकर जयंती पर लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन, दिल्ली तक गूँजी 2027 की हुंकार

उत्तर प्रदेश की सियासत में आज का दिन महज़ एक तारीख नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का महा-शंखनाद बन गया। जी हां लखनऊ की गलियों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती पर श्रद्धा के फूलों से ज़्यादा सियासी तीरों की बौछार हुई। हज़रतगंज के चौराहे से लेकर गोमतीनगर के स्मारकों तक, नीले, केसरिया और लाल झंडों के बीच एक ही शोर था....दलितों और पिछड़ों का असली मसीहा कौन?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने आज लखनऊ के हजरतगंज पहुंचकर बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, लेकिन उनके इरादे फूलों की तरह कोमल नहीं, बल्कि फौलाद की तरह सख्त नजर आए। पत्रकारों से मुखातिब होते हुए अखिलेश ने बीजेपी सरकार की जड़ों पर प्रहार किया। उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज़ में कहा, "बीजेपी के 10 साल के राज में बाबा साहेब की सबसे ज़्यादा मूर्तियाँ तोड़ी गईं। जो लोग नफ़रत की राजनीति करते हैं, वो आज चुनाव करीब देख बजट का झुनझुना थमाकर झूठा संदेश देना चाहते हैं।" अखिलेश यहीं नहीं रुके, उन्होंने नोएडा की हालिया घटनाओं को सरकार की विफलता करार देते हुए सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साधा और दावा किया कि 2027 में बीजेपी का बोरिया-बिस्तर बंधना तय है। उन्होंने साफ़ कर दिया कि PDA का फॉर्मूला ही सामाजिक न्याय की नई इबारत लिखेगा।

वहीं दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपने आवास पर बाबा साहेब को नमन किया, लेकिन असली धमाका सड़कों पर दिखा। लखनऊ में आज बसपा ने ऐतिहासिक और भव्य रैली के जरिए अपनी ताकत का अहसास कराया। गोमतीनगर का आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल नीले समंदर में तब्दील हो गया, जहाँ प्रदेश के 18 मंडलों से आए लाखों कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। मायावती ने केंद्र और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करते हुए सोशल मीडिया पर एक लंबी और तीखी पोस्ट लिखी। उन्होंने कहा कि....अगर सत्ताधारी पार्टियों ने संविधान को सही से लागू किया होता, तो देश आज ग़रीबी और जातिवाद से मुक्त होकर आत्मनिर्भर बन चुका होता। 

इतना ही नहीं मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं को मिशनरी भावना से जुटने का आह्वान किया और साफ़ संदेश दिया कि बहुजन समाज का असली रक्षक केवल बसपा ही है। वहीं सत्ता पक्ष ने भी इस मौके को किसी उत्सव से कम नहीं रहने दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाबा साहेब को 'भारत माँ का अनमोल रत्न' बताते हुए उन्हें समता और समावेशी समाज का शिल्पकार कहा। बीजेपी ने इस अवसर पर 'युवा संवाद संगम' जैसे मेगा इवेंट्स किए और मूर्तियों के सौंदर्यीकरण के साथ-साथ 11 हजार दीप जलाकर बाबा साहेब के प्रति अपनी अटूट आस्था का प्रदर्शन किया। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक ने प्रधानमंत्री मोदी के पंचतीर्थ विजन का हवाला देते हुए कहा कि बीजेपी सरकार बाबा साहेब के सपनों को धरातल पर उतार रही है। बीजेपी का रणनीतिक रुख साफ़ था कि दलित वोट बैंक को यह समझाना कि उनके हक और सम्मान की रक्षा केवल डबल इंजन सरकार ही कर सकती है।

आपको बता दें आज लखनऊ में जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ एक जयंती का कार्यक्रम नहीं था। यह 2027 के सिंहासन तक पहुँचने की पहली सीढ़ी थी। जहाँ एक तरफ बसपा ने लाखों की भीड़ जुटाकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया और साबित किया कि उसका कैडर आज भी चट्टान की तरह खड़ा है, वहीं सपा ने PDA के जरिए दलित-पिछड़ा गठजोड़ को धार दी। बीजेपी ने अपनी सरकारी योजनाओं और अंत्योदय के मंत्र से सेंधमारी की कोशिश की। देखा जाए तो नोएडा की घटना हो या संविधान बचाने की जंग, हर नेता ने बाबा साहेब के नाम को अपना ढाल और तलवार दोनों बनाया। आज की इन रैलियों और बयानों ने यह साफ़ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता बाबा साहेब के चरणों से होकर ही गुजरेगा। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि बाबा साहेब की विरासत पर दावेदारी ठोकने की यह जंग अब और तेज होने वाली है। नेता अपनी अपनी डफली बजा रहे हैं, लेकिन असली फैसला उत्तर प्रदेश की वह जनता करेगी जिसे अखिलेश यादव सतर्क बता रहे हैं और मायावती मंजिल की राही। फिलहाल 2027 की आहट ने आज यूपी की सियासत का पारा सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है! 

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