स्कूलों की शिकायतें अब नहीं दबेंगी! योगी सरकार ने अफसरों को दिए सख्त निर्देश
उत्तर प्रदेश में अब स्कूलों की बदहाली...बच्चों की शिकायत...शिक्षकों की कमी...बारिश में जलभराव...स्कूलों में साफ-सफाई से लेकर पढ़ाई और खानपान की व्यवस्था तक...सरकार रडार पर आ गई है। जी हां बीते कुछ दिनों में यूपी के अलग-अलग जिलों से ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जहां अपनी छोटी-छोटी मांगों और स्कूल की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर स्कूली बच्चे तक सड़क पर उतरते नजर आए। कहीं शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठा, कहीं स्कूल की बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े हुए और कहीं बच्चों और अभिभावकों ने व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें सामने रखीं। वहीं अब इन प्रदर्शनों को योगी सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ संदेश दिया है कि बच्चों को अपनी समस्या बताने के लिए सड़क पर उतरने की नौबत नहीं आनी चाहिए। स्कूलों में अगर कोई कमी है, अगर किसी बच्चे या अभिभावक की शिकायत है, अगर शिक्षक नहीं हैं, अगर पढ़ाई प्रभावित हो रही है या फिर स्कूल की बुनियादी सुविधाएं बदहाल हैं...तो उसकी जिम्मेदारी तय होगी और समस्या का समयबद्ध तरीके से समाधान कराया जाएगा। यानी अब सवाल सिर्फ शिकायत का नहीं होगा... सवाल ये भी होगा कि शिकायत मिलने के बाद जिम्मेदार अफसर ने किया क्या?
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद शासन ने पूरे प्रदेश में स्कूलों की निगरानी और शिकायतों के निस्तारण का सिस्टम और सख्त कर दिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया गया है। ये अधिकारी अलग-अलग जिलों और शिक्षण संस्थानों में सामने आने वाली समस्याओं पर नजर रखेंगे और यह भी देखेंगे कि शिकायत के बाद कार्रवाई हुई या मामला सिर्फ कागजों में दबकर रह गया। वहीं मुख्य सचिव एसपी गोयल के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी शर्मा ने सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को भी विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार ने साफ कहा है कि स्कूलों से जुड़ी कोई शिकायत सामने आती है तो उसकी जांच कराई जाए। अगर शिकायत सही है तो तत्काल समाधान कराया जाए...और अगर सूचना गलत या भ्रामक है तो उसका भी तुरंत खंडन किया जाए। आपको बता दें हाल के दिनों में तो हालात यहां तक पहुंचे कि छोटे-छोटे स्कूली छात्र और छात्राएं अपनी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करने लगे। लखनऊ में छात्राओं की ओर से शिक्षकों की कमी को लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा आजमगढ़, महोबा, हमीरपुर और उन्नाव समेत कई जिलों से भी शिक्षण संस्थानों की व्यवस्थाओं, शिक्षकों की कमी और दूसरी समस्याओं को लेकर शिकायतें सामने आईं। इन घटनाओं ने शासन का ध्यान खींचा और अब सरकार ने अधिकारियों को सीधे मैदान में उतरकर स्थिति देखने के निर्देश दिए हैं।
दरअसल, सरकार का फोकस सिर्फ स्कूल की बिल्डिंग तक सीमित नहीं है। पठन-पाठन कैसा चल रहा है... स्कूल में शिक्षक पर्याप्त हैं या नहीं... बच्चे और शिक्षक नियमित रूप से स्कूल आ रहे हैं या नहीं...बच्चों को पीने का पानी मिल रहा है या नहीं... स्कूल की बिजली व्यवस्था ठीक है या नहीं... स्कूल किचन शेड की स्थिति कैसी है...साफ-सफाई कैसी है... बारिश में जलभराव तो नहीं हो रहा... बच्चों को किताबें, यूनिफॉर्म, जूता-मोजा और बैग के लिए मिलने वाली राशि समय पर मिल रही है या नहीं... इन सभी चीजों की निगरानी की जाएगी। यानी सरकार अब स्कूल की पूरी व्यवस्था की ग्राउंड रिपोर्ट चाहती है। इतना ही नहीं सरकार ने अधिकारियों को एक और अहम जिम्मेदारी दी है कि बच्चों और उनके अभिभावकों से लगातार संवाद करें। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वह केवल दफ्तर में बैठकर रिपोर्ट का इंतजार न करें, बल्कि अपने क्षेत्र के स्कूलों का दौरा करें और बच्चों से सीधे बात करें। बच्चों से पूछा जाए कि उन्हें स्कूल में क्या परेशानी है... पढ़ाई का स्तर कैसा है...शिक्षक नियमित आते हैं या नहीं...स्कूल में किसी सुविधा की कमी तो नहीं... खाना कैसा मिलता है...पीने का पानी उपलब्ध है या नहीं...साफ-सफाई की स्थिति कैसी है। सरकार का मानना है कि जेन अल्फा की जरूरतों को समझने के लिए उनसे सीधे बातचीत करना जरूरी है। इसलिए अधिकारियों को स्कूलों में जाकर बच्चों से बात करने और उनकी वास्तविक समस्याओं को समझने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का मकसद साफ है कि वास्तविक शिकायत दबनी नहीं चाहिए और गलत सूचना के नाम पर अफवाह भी नहीं फैलनी चाहिए।
आपको बता दें मुख्यमंत्री के निर्देश पर सिर्फ बेसिक और माध्यमिक विद्यालय ही नहीं, बल्कि अलग-अलग विभागों के अंतर्गत आने वाले शिक्षण संस्थानों की भी निगरानी की जाएगी। जहां भी शिकायत या व्यवस्था में कमी सामने आएगी, वहां उसके तत्काल निस्तारण की कोशिश की जाएगी। और अगर लापरवाही मिली तो संबंधित अधिकारी और कर्मचारी को चिह्नित कर उसकी जवाबदेही तय की जाएगी। पूरे मामले में योगी सरकार का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बच्चों की शिकायत को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा। लखनऊ हो... आजमगढ़ हो... महोबा हो... हमीरपुर हो... उन्नाव हो या प्रदेश का कोई और जिला अगर किसी स्कूल की व्यवस्था को लेकर बच्चे या अभिभावक शिकायत करते हैं तो अधिकारी उसकी जांच करेंगे।
तो कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में स्कूलों की व्यवस्था को लेकर सरकार ने अब अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। बच्चे सड़क पर उतरें... स्कूल में शिक्षक न हों... पढ़ाई प्रभावित हो... बारिश में स्कूल डूबे... साफ-सफाई की हालत खराब हो...या फिर स्कूल से जुड़ी कोई शिकायत सोशल मीडिया पर सामने आए अब इन मामलों को नजरअंदाज करना अधिकारियों के लिए आसान नहीं होगा। सरकार की कोशिश यही है कि बच्चों को अपनी आवाज उठाने के लिए सड़क पर न उतरना पड़े... उनकी बात स्कूल और प्रशासन के स्तर पर ही सुनी जाए... और स्कूल में उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ जरूरी बुनियादी सुविधाएं भी मिलें। क्योंकि स्कूल सिर्फ चार दीवारों और एक बोर्ड का नाम नहीं है... स्कूल बच्चों के भविष्य की नींव है। और अगर उसी नींव में कमी होगी, तो सवाल सिर्फ आज की व्यवस्था पर नहीं... आने वाले कल पर भी उठेगा। अब देखना होगा कि शासन के ये सख्त निर्देश जमीन पर कितनी तेजी से उतरते हैं और जिन स्कूलों में शिकायतें सामने आई हैं, वहां वास्तव में कितनी तस्वीर बदलती है।
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