उत्तर प्रदेश विधानसभा: तब और अब… सत्ता की पूरी कहानी

उत्तर प्रदेश विधानसभा भारतीय लोकतंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्तंभ रही है। यह केवल किसी राज्य का विधानमंडल नहीं, बल्कि वह मंच है जहाँ से देश की राजनीति की दिशा कई बार तय हुई है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है और इसी कारण इसकी विधानसभा भी दुनिया की सबसे बड़ी विधानसभाओं में गिनी जाती है। यहां होने वाले राजनीतिक प्रयोगों, आंदोलनों और सत्ता परिवर्तनों का असर हमेशा राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ा है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा का गठन स्वतंत्र भारत में 1952 में हुआ, जब देश में पहली बार आम चुनाव कराए गए। उस समय इसे “यूनाइटेड प्रोविंसेज़” कहा जाता था, जो बाद में उत्तर प्रदेश बना। शुरुआती दशकों में विधानसभा पर कांग्रेस पार्टी का पूर्ण वर्चस्व रहा। पंडित गोविंद बल्लभ पंत, डॉ. संपूर्णानंद और चंद्रभानु गुप्त जैसे नेताओं ने विधानसभा के माध्यम से राज्य की नीतियों को आकार दिया। यह वह दौर था जब आज़ादी के बाद राष्ट्र निर्माण की प्राथमिकताएँ—शिक्षा, भूमि सुधार, औद्योगिक विकास—विधानसभा की बहसों का केंद्र थीं।

1960 और 1970 के दशक तक कांग्रेस का प्रभुत्व बना रहा, लेकिन इसी दौर में विधानसभा के भीतर असंतोष और वैकल्पिक राजनीति के बीज भी पड़े। 1967 का चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ, जब पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। यह घटना न केवल यूपी विधानसभा के इतिहास में, बल्कि पूरे देश में गैर-कांग्रेसवाद की शुरुआत का प्रतीक बनी। इसके बाद गठबंधन सरकारों और अस्थिर राजनीतिक दौर ने विधानसभा को कई बार भंग होते भी देखा।

1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी की जीत ने उत्तर प्रदेश विधानसभा को एक नई पहचान दी। यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का प्रतीक था। विधानसभा के भीतर सत्ता और विपक्ष की भूमिका अधिक मुखर हुई। हालांकि यह प्रयोग लंबे समय तक स्थिर नहीं रहा, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया कि यूपी विधानसभा अब केवल एक पार्टी का गढ़ नहीं रही।

1980 और 1990 का दशक उत्तर प्रदेश विधानसभा के इतिहास का सबसे निर्णायक काल माना जाता है। इसी समय मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति उभरकर सामने आई। पिछड़े वर्गों और दलितों की राजनीतिक भागीदारी ने विधानसभा की संरचना ही बदल दी। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम जैसे नेताओं ने समाजवादी और बहुजन राजनीति को मजबूती दी। 1989 के बाद कांग्रेस लगभग हाशिये पर चली गई और विधानसभा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा के बीच सत्ता संघर्ष का मैदान बन गई।

1990 का दशक राम मंदिर आंदोलन के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। अयोध्या मुद्दे ने उत्तर प्रदेश विधानसभा की राजनीति को पूरी तरह राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। भाजपा का उदय इसी दौर में हुआ और 1991 में पहली बार उसने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद विधानसभा भंग हुई, जिसने यह दिखा दिया कि यूपी की राजनीति कितनी गहराई से देश की भावनाओं और घटनाओं से जुड़ी है।

2000 के बाद का दौर गठबंधन राजनीति और अस्थिर सरकारों का रहा। कभी सपा-बसपा गठबंधन, कभी भाजपा-बसपा प्रयोग—इन सबने विधानसभा को सत्ता जोड़-तोड़ का केंद्र बना दिया। मायावती का मुख्यमंत्री बनना सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए ऐतिहासिक क्षण था। उन्होंने विधानसभा के जरिए दलित राजनीति को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। वहीं, अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने युवा राजनीति और विकास के नए नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और निर्णायक मोड़ लेकर आया। भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब उत्तर प्रदेश में बिना किसी बड़े चेहरे के चुनाव लड़कर भाजपा ने इतनी बड़ी जीत दर्ज की। इस जीत ने विधानसभा में सत्ता के केंद्रीकरण और मजबूत नेतृत्व मॉडल को स्थापित किया। कानून-व्यवस्था, विकास और हिंदुत्व—तीनों मुद्दे विधानसभा की कार्यवाही और सरकार की प्राथमिकताओं में साफ दिखाई देने लगे।

2022 में योगी आदित्यनाथ का दोबारा मुख्यमंत्री बनना यूपी विधानसभा के इतिहास में एक दुर्लभ घटना थी। लंबे समय बाद किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दूसरी बार पूर्ण कार्यकाल के साथ सत्ता हासिल की। यह संकेत था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में स्थिर सरकार का एक नया दौर शुरू हुआ है। विपक्ष की भूमिका कमजोर होती दिखी, और विधानसभा में बहसों की प्रकृति भी बदली।

आज उत्तर प्रदेश विधानसभा केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि 2027 और 2029 की राजनीति का रणक्षेत्र भी है। यहां होने वाली हर बहस, हर विधेयक और हर राजनीतिक बयान का असर दिल्ली तक महसूस किया जाता है। विपक्ष लगातार सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने का आरोप लगाता है, जबकि सरकार इसे मजबूत नेतृत्व और निर्णायक शासन का दौर बताती है।

इस तरह उत्तर प्रदेश विधानसभा का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक प्रयोगों का जीवंत दस्तावेज़ है। कांग्रेस युग से समाजवादी-बहुजन राजनीति, मंडल आंदोलन से हिंदुत्व राजनीति और अब मजबूत सरकार के मॉडल तक—यूपी विधानसभा ने हर दौर में देश की राजनीति को दिशा दी है। आज भी यह सदन भविष्य की राजनीति का संकेतक बना हुआ है, और आने वाले वर्षों में भी इसकी भूमिका उतनी ही निर्णायक रहेगी।

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