अख़्तर-उल-ईमान: जिनकी नज़्में कहानियाँ भी सुनाती हैं और सवाल भी उठाती हैं
Akhtar-ul-Iman अपने दौर के बेहद संजीदा और प्रभावशाली शायरों में गिने जाते थे। वे सिर्फ एक शायर ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन संवाद लेखक भी थे। उनकी शायरियों का एक अहम संकलन ‘सरों-सामान’ नामक किताब में मिलता है, जो वर्ष 1983 में सारांश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई थी।
अक्सर लोग उन्हें केवल फिल्मों से जुड़े लेखक के रूप में पहचान लेते हैं, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। दरअसल फिल्मों में आने से पहले ही अख़्तर-उल-ईमान उर्दू अदब की दुनिया में एक स्थापित शायर और कहानीकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके थे। उनकी साहित्यिक पहचान इतनी मजबूत थी कि शायरी और नज़्म लिखने की इसी परंपरा ने उन्हें फिल्मों तक पहुंचने का रास्ता दिया। जीवन के आख़िरी समय तक वे लगातार शायरी लिखते रहे और अपनी संवेदनशील अभिव्यक्तियों के माध्यम से पाठकों के दिलों को छूते रहे।

अख़्तर-उल-ईमान की नज़्मों की सबसे खास बात यह थी कि वे महज़ कुछ पंक्तियों का काव्य नहीं लगतीं, बल्कि एक पूरी कहानी की तरह खुलती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन की जटिलताओं, अकेलेपन, उम्मीद और निराशा का गहरा एहसास मिलता है। उनकी नज़्में अक्सर पाठकों के सामने ऐसे सवाल छोड़ जाती हैं, जिनका जवाब हर व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर तलाशता है।
उनकी शायरी में मौजूद संवेदनशीलता और गहराई का अंदाज़ा इन पंक्तियों से लगाया जा सकता है, जिनमें जीवन की थकान, उम्मीद और टूटन का अनोखा संगम दिखाई देता है
“ग़ुनूदगी सी रही तारी उम्र भर हम पर
ये आरज़ू ही रही थोड़ी देर सो लेते
ख़लिश मिली है मुझे और कुछ नहीं अब तक
तिरे ख़याल से ऐ काश दर्द धो लेते…”
इसी तरह उनकी एक और नज़्म में समय की बदलती सूरत और इंसानी बेचैनी का भाव झलकता है
“हयूला कैसे बदलता है वक़्त हैराँ हूँ
फ़रेब और न खाए निगाह डरता हूँ
ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है पल-पल में
हज़ार बार सँभलता हूँ और मरता हूँ…”
अख़्तर-उल-ईमान की शायरी में जीवन के संघर्ष, रिश्तों की उलझनें और समय की बेरुख़ी बेहद सादगी और गहराई के साथ सामने आती हैं। यही वजह है कि उनकी नज़्में आज भी पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं और उर्दू साहित्य में उन्हें एक अलग और सम्मानित स्थान दिलाती हैं।
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