इस्लामाबाद में 21 घंटे तक 'महायुद्ध', फिर भी नहीं बनी बात! गालिबफ बोले-'अमेरिका पर भरोसा नहीं'
दुनिया की नजरें पिछले 48 घंटों से पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर टिकी थीं, जहाँ 40 दिनों के खूनी संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान की टीमें एक मेज पर थीं। उम्मीद थी कि अमन का कोई रास्ता निकलेगा, लेकिन 21 घंटे की भारी-भरकम चर्चा के बाद भी नतीजा 'सिफर' रहा। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया है, तो वहीं अमेरिका ने परमाणु मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया। आखिर बंद कमरों में क्या हुआ? आइए जानते हैं।
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने वार्ता खत्म होते ही मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने सीधे तौर पर अमेरिका को घेरा: गालिबफ ने कहा कि ईरान ने सकारात्मक प्रस्ताव दिए, लेकिन वाशिंगटन उनका विश्वास नहीं जीत पाया। उनके मुताबिक, अब अमेरिका ईरान के 'तर्क' को समझ चुका है और गेंद अब बाइडन/वेंस प्रशासन के पाले में है। पुराने युद्धों का हवाला देते हुए उन्होंने साफ किया कि ईरान अब किसी भी 'जल्दबाजी' में कोई समझौता नहीं करेगा। ईरान ने मेज पर 10 प्रमुख मांगें रखी थीं, जिनमें दो सबसे अहम थीं: लेबनान में युद्धविराम: ईरान चाहता है कि लेबनान में तुरंत सैन्य कार्रवाई रुके। इस पर पाक पीएम शहबाज शरीफ ने भी समर्थन जताया था। कतर और अन्य विदेशी बैंकों में फ्रीज (जमी हुई) ईरानी संपत्ति को तुरंत रिलीज किया जाए।
दूसरी ओर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने अपना 'बेस्ट और फाइनल' ऑफर दे दिया था।
अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त यह थी कि ईरान लिखित में दे कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। परमाणु कार्यक्रम के अलावा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की सुरक्षा और ट्रांजिट को लेकर भी दोनों पक्षों में ठन गई। गालिबफ ने इस कठिन वार्ता की मेजबानी के लिए पाकिस्तान का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने 9 करोड़ ईरानियों की एकता और सर्वोच्च नेता के मार्गदर्शन का जिक्र करते हुए अपने दल को शाबाशी दी और कहा "ईरान जिंदाबाद!"
भले ही वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हुई हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 21 घंटे तक बातचीत का चलना ही संकेत है कि दोनों पक्ष सीधे टकराव से बचना चाहते हैं। फिलहाल, यह 'कोल्ड वॉर' कूटनीतिक गलियारों में जारी रहेगी।


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