उसकी देह में रखे हैं मेरे पंख, मेरी देह उसके स्पर्श का घर है।

मध्यप्रदेश के इंदौर की धरती पर जन्मे कवि आशुतोष द्विवेदी एक बहुत ही उम्दा कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में शब्दों की कोमलता और शैली की सहजता अकस्मात् ही हृदय पर अंकित हो जाती है। कवि आशुतोष द्विवेदी की प्रमुख रचनाओं में "चोर दरवाज़े से", "असंभव सारांश", "यकीन की आयतें", "विदा लेना बाकी रहे" आदि शामिल हैं। वहीं आपको बता दें कि कवि आशुतोष द्विवेदी को "रजा पुरस्कार", "केदार सम्मान", "अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार" और "वागीश्वरी पुरस्कार" जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। तो आइये आज हम और आप पढ़ते हैं कवि आशुतोष द्विवेदी की कुछ चुनिन्दा रचनाएँ...।
मेरे आसपास का संसार
आविष्ट है
एक छुअन की स्मृति से
आकाश में से थोड़ा
आकाश लेता हूँ
पृथ्वी में से लेता हूँ
थोड़ी सी पृथ्वी
एक आवाज़ की
ओस भीगी उंगलियों से
छुआ गया हूँ
एक दृष्टि की कहन में
जैसे घोर वन में
घिरा हुआ
रास्ता ढूँढता हूँ
असमाप्त स्पन्दनों की
लगतार लय में
बह निकलने के पहले
सितार के तारों में
उत्सुक प्रतीक्षा का तनाव है
थोड़े से आकाश में उड़ता हूँ
थोड़ी सी पृथ्वी पर रहता हूँ
उसकी देह में रखे हैं मेरे पंख
मेरी देह उसके स्पर्श का घर है।
उसकी धौंकनी से दम फूलता है इच्छाओं को
स्वप्न उसकी टापों में लगातार बजते हैं
वह एक कौंध की तरह गुज़रता है
पण्य-वीथियों में श्रेष्ठि उसे मुँह बाए देखते हैं
हर गुज़रते लक्ष्य के साथ
सुनहरी होती जाती है उसकी अयाल
वह अधिक रम्य होता जाता है
और अधिक काम्य
संभव नहीं रहता उस
सदेह चुनौती की ताब में ला पाना
पुरवासियों की श्वासलय उखड़ने लगती है
जैसे गिरती हो गरज के साथ बिजली
और ठठरी हो जाता है सब्ज पेड़
ऐसे कूदता है वह
मल्टी नेशनल की आठवीं मंज़िल से
सात समंदर पार धुर देहात में
और घास के बजाए चबाने लगता है नीम
देखते-देखते स्वाद बदलने लगते हैं अर्थ
ताज्जुब के लिए बहुत देर हो चुकती है
बात की बात में ढह जाते हैं दुर्जय किले
गर्दन का खम किसी का साबुत नहीं बचता
पीछे-पीछे आते हैं प्रधान ऋत्विज
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सीढ़ियाँ उतरकर
राजपुरुष, सेनानायक और वित्तमंत्री के दूत
न्यौतते हैं पुरवासियों को यज्ञभूमि में
पुण्य और प्रसाद पाने के लिए
पता नहीं कब, कौन थामेगा
इस साक्षात गति की वल्गाएँ
बाँधा जाएगा किस यूप से
किन तलवारों से छुआ जाएगा
कौन लेगा आहुति की धूम्रगंध विधिपूर्वक
अभी तो यह नाप रहा है समूची पृथ्वी
चमक रही हैं इसकी आँखें
जिधर से भी गुज़रता है
वनस्पतियाँ झुलस जाती हैं
गाढ़ा हो जाता है लालसा का रंग
चारण विजयगीत गाते हैं
कुछ न कुछ बदल ही जाता है
सबके भीतर।
बहुत पुरानी चाबियों का एक गुच्छा है
जो इस जंग लगे ताले पर आजमाया जाएगा
जो मैं हूँ
मुझे बहुत वक़्त से बंद पड़ी दराज़ की तरह खोला जाएगा
वह ढूँढ़ने के लिए जो मुझमें कभी था ही नहीं
जो मिलेगा
वह ढूँढ़ने वालों के लिए बेकार होगा
जो चाबी मुझे खोलेगी
वह मेरे बारे में नहीं, अपने बारे में ज़्यादा बताएगी
मैं एक बड़ी निराशा पर जड़ा एक जंग लगा ताला हूँ
मुझे एक बाँझ उम्मीद से खोला जाएगा
झुँझलाहट में इस दराज़ को तितर-बितर कर दिया जाएगा
शायद उलट भी दिया जाए फ़र्श पर
कुछ भी करना,
झाँकना, टटोलना, झुँझलाना,
फिर बन्द कर देना
मैं वहाँ धड़कता रहूँगा इन्तज़ार के अन्धेरे में
मुझे एक धीमी-सी आवाज़ खोलेगी किसी दिन।
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