लखनऊ की सड़कों पर नीले झंडे, मायावती दिखाएंगी दलितों की शक्ति
उत्तर प्रदेश की सियासी सरजमीं पर 2027 का रण अब औपचारिक तारीखों का मोहताज नहीं रहा। सूबे की आबो-हवा में चुनावी बारूद की गंध घुलने लगी है। एक तरफ अखिलेश यादव का 'PDA' रथ है, दूसरी तरफ भाजपा की 'विकास वाली हुंकार', और अब इन सबके बीच 'हाथी' ने अपनी वो चिंघाड़ मारी है जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जी हां बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए 'मिशन-2027' का जो खाका खींचा है, वह न केवल बसपा के अस्तित्व की लड़ाई है, बल्कि यूपी की त्रिकोणीय राजनीति को एक नया मोड़ देने वाली रणनीति भी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'सोशल इंजीनियरिंग' की जननी कही जाने वाली मायावती ने साफ कर दिया है कि वह हार मानने वालों में से नहीं हैं। मंगलवार को लखनऊ में हुई हाई-प्रोफाइल बैठक में मायावती ने अपने सिपहसालारों को जो मंत्र दिया, उसका केंद्र बिंदु है....14 अप्रैल, अंबेडकर जयंती। आपको बता दें इस बार बसपा ने अपना शक्ति प्रदर्शन नोएडा के बजाय राजधानी लखनऊ में करने का फैसला लिया है। यह महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विरोधियों को यह बताने की कोशिश है कि बसपा का आधार अभी भी प्रदेश के दिल में धड़क रहा है। मायावती ने साफ निर्देश दिए हैं कि 14 अप्रैल को लखनऊ की सड़कें नीले झंडों से पट जानी चाहिए, ताकि उन दावों को खारिज किया जा सके कि बसपा खत्म हो चुकी है। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत इस बार सबसे दिलचस्प मोड़ पर है। अखिलेश यादव ने दादरी से अभियान शुरू कर गुर्जर, मुस्लिम और दलित वोटों के जिस कॉकटेल को साधने की कोशिश की है, उसने मायावती की पेशानी पर बल ला दिए हैं। यही वजह है कि मायावती ने वेस्ट यूपी को अलग राज्य बनाने का अपना पुराना तुरुप का पत्ता फिर से चल दिया है। मायावती जानती हैं कि अगर दलित-मुस्लिम-गुर्जर गठजोड़ सपा की ओर खिसका, तो बसपा के लिए सत्ता की राहें हमेशा के लिए धुंधली हो सकती हैं। इसीलिए, उन्होंने अपनी रणनीति को धार देते हुए अब सीधे तौर पर भाजपा के साथ-साथ सपा और कांग्रेस पर भी तीखे हमले शुरू कर दिए हैं।
दरअसल, पिछले कुछ चुनावों से मायावती पर बीजेपी की मददगार होने के आरोप लगते रहे हैं। इसी छवि ने मुस्लिम वोटरों को उनसे दूर कर दिया। लेकिन इस बार की बैठक में मायावती का तेवर बदला-बदला नजर आया। उन्होंने केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और आसमान छूती कीमतों पर जमकर घेरा। पेट्रोल, डीजल और गैस सिलेंडर के बढ़ते दामों को मुद्दा बनाकर मायावती ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह अब भाजपा के खिलाफ फ्रंट फुट पर खेलेंगी। यह उनकी 'बी-टीम' वाली छवि को तोड़ने और खिसके हुए मुस्लिम व दलित वोटबैंक को वापस लाने की सोची-समझी रणनीति है। आपको बता दें मायावती ने 2027 की नईया पार करने के लिए दो नए और कड़े नियम तय किए हैं।
पहला ये कि बसपा प्रमुख ने साफ कर दिया है कि 2027 के चुनाव में किसी भी माफिया, गुंडे या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जाएगा। वह बसपा की उस पुरानी छवि को वापस लाना चाहती हैं जब 'कानून द्वारा कानून का राज' उनका सिग्नेचर स्टाइल हुआ करता था। और दूसरा, दलितों के साथ-साथ ब्राह्मण, ठाकुर, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देकर मायावती 2007 के उस जादू को दोहराना चाहती हैं, जिसने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी। इसलिए इंडिया गठबंधन और NDA की उठापटक के बीच मायावती ने एक बार फिर 'एकला चलो' की राह चुनी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वह किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। उनका मानना है कि गठबंधन में बसपा का वोट तो दूसरे दलों को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन दूसरे दलों का वोट बसपा को नहीं मिलता। अब वह बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत कर अपने 'कोर कैडर' को रिचार्ज करने में जुट गई हैं।
देखा जाए तो यूपी के 22 फीसदी दलित वोट बैंक पर इस वक्त गिद्ध जैसी नजरें जमी हैं। राहुल गांधी का कांशीराम जी को भारत रत्न देने की मांग करना और अखिलेश यादव का 'PDA' के जरिए दलितों को जोड़ना, यह बताता है कि बसपा के किले में सेंधमारी की कोशिशें चरम पर हैं। मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने 9 फीसदी तक गिर चुके वोट शेयर को फिर से दहाई के आंकड़ों के पार ले जाने की है। ऐसे में 2027 का चुनाव मायावती के लिए सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत को बचाने की अग्निपरीक्षा है। 'जय भीम' के नारों की गूंज अब सपा और कांग्रेस के मंचों पर भी सुनाई दे रही है, ऐसे में मायावती को यह साबित करना होगा कि दलितों की असली मसीहा आज भी वही हैं। लखनऊ की बैठक में दिखा उत्साह और कड़े तेवर बताते हैं कि बहनजी ने अपनी रणनीति बदल ली है। अब देखना यह होगा कि 14 अप्रैल को लखनऊ में जुटने वाली भीड़ 2027 के सिंहासन की राह कितनी आसान बनाती है। यूपी की सियासत अब उस मोड़ पर है जहां हर चाल शह और मात की है!
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