बैकुंठ द्वार: मोक्ष का प्रतीक और आस्था का महासंगम
उत्तर भारत के विशालतम दक्षिण भारतीय शैली के श्री रंगनाथ मंदिर में बैकुंठ एकादशी का पर्व केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि भक्तों के लिए जीवन का सबसे पावन अवसर माना जाता है। इस दिन वर्ष में केवल एक बार खुलने वाला बैकुंठ द्वार श्रद्धा, विश्वास और मोक्ष की कामना का सजीव प्रतीक बन जाता है।
क्या है बैकुंठ द्वार?
बैकुंठ द्वार मंदिर का वह विशिष्ट द्वार है जिसे भगवान विष्णु के धाम बैकुंठ लोक का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त बैकुंठ एकादशी के दिन इस द्वार से होकर निकलता है, उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है।
यही कारण है कि यह द्वार साल में केवल एक बार, बैकुंठ एकादशी के ब्रह्म मुहूर्त में खोला जाता है, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
बैकुंठ एकादशी: आस्था का महापर्व
21 दिवसीय बैकुंठ उत्सव के 11वें दिन पड़ने वाली बैकुंठ एकादशी को वर्ष की सबसे श्रेष्ठ एकादशियों में गिना जाता है। इस दिन भगवान रंगनाथ माता गोदा (आंडाल) के साथ पालकी में विराजमान होकर परंपरागत वाद्य यंत्रों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बैकुंठ द्वार तक आते हैं।
जब भगवान स्वयं भक्तों को दर्शन देते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात बैकुंठ धरती पर उतर आया हो।
वैदिक मंत्र, भजन और कुंभ आरती
बैकुंठ द्वार पर पहुँचने के बाद मंदिर के महंत और सेवायत पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रों के साथ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
भगवान रंगनाथ के साथ शठ कोप स्वामी, नाथ मुनि स्वामी और आलवार संतों की **कुंभ आरती** होती है।
इसके पश्चात भगवान की सवारी मंदिर प्रांगण का भ्रमण कर **पौंडानाथ मंदिर** (जिसे बैकुंठ लोक माना जाता है) में विराजमान होती है, जहां भक्त भजनों के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
भव्य सजावट: जब बैकुंठ साकार हो उठे
वर्ष में एक बार खुलने वाले इस दिव्य द्वार को सजाने के लिए लगभग एक हजार किलो से अधिक फूल वृंदावन, दिल्ली और बेंगलुरु से मंगाए जाते हैं।
फूलों और आकर्षक लाइटिंग से सजा बैकुंठ लोक ऐसा आभास कराता है जैसे भगवान स्वयं अपने धाम में विराजमान हों। यह दृश्य भक्तों के मन को भाव-विभोर कर देता है।
भक्तों का जनसैलाब
बैकुंठ द्वार से निकलने की कामना लेकर हजारों श्रद्धालु रात से ही मंदिर परिसर में एकत्रित होने लगते हैं।
कोई मोक्ष की प्रार्थना करता है, कोई परिवार की सुख-शांति के लिए आता है, तो कोई केवल भगवान के दर्शन मात्र से ही कृतार्थ हो जाता है।
यह जनसैलाब बताता है कि आज भी आस्था लोगों को एक सूत्र में बांधने की सबसे बड़ी शक्ति है।
क्यों है बैकुंठ द्वार इतना विशेष?
- यह मोक्ष का प्रतीक है
- वर्ष में केवल एक बार खुलता है
- वैदिक परंपराओं और दक्षिण भारतीय वैष्णव संस्कृति का अद्भुत संगम
- भक्त और भगवान के बीच आत्मिक संबंध का उत्सव
बैकुंठ द्वार केवल एक द्वार नहीं, बल्कि श्रद्धा, मोक्ष और आध्यात्मिक आनंद का प्रवेश द्वार है।
बैकुंठ एकादशी के दिन जब यह द्वार खुलता है, तो न केवल मंदिर के कपाट खुलते हैं, बल्कि लाखों भक्तों के हृदय भी प्रभु भक्ति से प्रकाशित हो उठते हैं।
अगर कभी जीवन में सच्ची आध्यात्मिक अनुभूति करनी हो, तो बैकुंठ एकादशी पर बैकुंठ द्वार के दर्शन अवश्य करें — क्योंकि यहां आस्था साक्षात ईश्वर से मिलती है।

No Previous Comments found.