‘वंदे मातरम्’ पर शर्मिला टैगोर की राय से असहमत कंगना, दिया करारा जवाब

by - Arshita Singh

 

देश के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी बहस अब बॉलीवुड की दो जानी-मानी अभिनेत्रियों कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर के बीच विचारों के मतभेद तक पहुंच गई है। दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने भारत की धार्मिक विविधता का हवाला देते हुए ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों को अपनाने की बात कही। उनके इस बयान पर कंगना रनौत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?

Sharmila TAGORE - Festival de Cannes

शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ के विभिन्न छंदों को लेकर अपनी राय जाहिर करते हुए कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में अलग-अलग धर्मों और आस्थाओं की संवेदनशीलता का ध्यान रखना जरूरी है। उनका मानना है कि गीत के शुरुआती दो छंद अपेक्षाकृत अधिक समावेशी हैं, जबकि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ दिखाई देते हैं।

शर्मिला टैगोर के अनुसार, एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए गीत के बाद के हिस्सों को स्वीकार करना कुछ हद तक असहज हो सकता है। ऐसे में उन्होंने देश की धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए शुरुआती दो छंदों तक सीमित रहने के विचार का समर्थन किया।

कंगना रनौत ने दिया जवाब

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शर्मिला टैगोर की टिप्पणी सामने आने के बाद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने कहा कि एक कलाकार के रूप में शर्मिला टैगोर के विचारों को देखकर उन्हें हैरानी हुई। कंगना ने उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम मानसिकता’ से ऊपर उठकर इस विषय को देखने की सलाह दी।

कंगना का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ को केवल धार्मिक नजरिए से देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार, यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और देशभक्ति की भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है और इसे राष्ट्रीय एकता के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

 आखिर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर विवाद क्या है?

Kangana Ranaut, Sharmila Tagore, Hema Malini संग Rekha ...

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत भारतीयों के बीच राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना जगाने वाले प्रमुख प्रतीकों में शामिल रहा।

हालांकि, गीत के बाद के कुछ छंदों में देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भ मौजूद हैं। इसी वजह से समय-समय पर इसके इस्तेमाल और सभी धार्मिक समुदायों द्वारा इसकी स्वीकार्यता को लेकर बहस होती रही है।

इस मुद्दे पर मुख्य रूप से दो तरह के विचार सामने आते हैं। एक पक्ष ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रभक्ति की ऐतिहासिक विरासत के रूप में देखता है। वहीं दूसरा पक्ष इसके धार्मिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए सभी समुदायों की भावनाओं और आस्थाओं का सम्मान करने पर जोर देता है।

 2026 में फिर क्यों चर्चा में आया मामला?

अगस्त 2026 में स्वतंत्रता दिवस के आसपास ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हुई। कांग्रेस मुख्यालय में 15 अगस्त के कार्यक्रम के दौरान गीत के गायन को लेकर भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बीच बयानबाजी हुई। इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण और शुरुआती दो छंदों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा ने जोर पकड़ लिया।

इसी व्यापक बहस के बीच शर्मिला टैगोर की टिप्पणी सामने आई। इसके बाद कंगना रनौत की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को बॉलीवुड से जुड़े लोगों और आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बना दिया।

कंगना और शर्मिला के विचारों में क्या अंतर है?

दोनों अभिनेत्रियों के विचारों में मूल अंतर उनके दृष्टिकोण को लेकर दिखाई देता है।

शर्मिला टैगोर का जोर भारत की धार्मिक विविधता और विभिन्न समुदायों की आस्थाओं के सम्मान पर है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जिससे देश के अलग-अलग धार्मिक समुदाय खुद को सहज और सम्मानित महसूस कर सकें।

दूसरी ओर, कंगना रनौत ‘वंदे मातरम्’ को भारत के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय भावना से जुड़े प्रतीक के तौर पर देखती हैं। उनका तर्क है कि इस गीत की व्याख्या केवल धार्मिक आधार पर करने के बजाय इसके ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी महत्व को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

 क्या यह सिर्फ बॉलीवुड की बहस है?

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यह मामला केवल दो अभिनेत्रियों के बीच मतभेद तक सीमित नहीं है। ‘वंदे मातरम्’ को लेकर होने वाली बहस भारत के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम, धार्मिक विविधता और राष्ट्रीय प्रतीकों की भूमिका जैसे व्यापक विषयों से जुड़ी हुई है।

एक ओर ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में एकता और राष्ट्रभावना पैदा करने वाले गीत के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर, इसके कुछ धार्मिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग समय पर सवाल और आपत्तियां भी सामने आती रही हैं।

2026 में राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह पुरानी बहस एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।


कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर के बीच सामने आया यह मतभेद ‘वंदे मातरम्’ की राष्ट्रीय विरासत और भारत की धार्मिक विविधता के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाता है।

जहां शर्मिला टैगोर सभी समुदायों की धार्मिक भावनाओं और संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखने की जरूरत पर जोर देती हैं, वहीं कंगना रनौत ‘वंदे मातरम्’ को धार्मिक बहस से ऊपर उठकर राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देखने की बात करती हैं।

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