वीर बहादुर सिंह: बाढ़ से सीएम तक, सासायता की अनछुई कहानी

1980 के दशक के मध्य में उत्तर प्रदेश राजनीति के इतिहास में सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था। भ्रष्‍टाचार और जन-आक्रोश के बीच, एक ऐसे नेता ने उभर कर जनता का विश्वास जीता, जो सादगी से सज-धजकर सत्ता संभालने आए — उनकी कहानी है वीर बहादुर सिंह की।

वर्ष 1985 में भारी बाढ़ की विपदा में प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा यूपी दौरा किया गया था। नौबत आ पहुँची कि गोरखपुर के कांग्रेसी नेता वीर बहादुर सिंह को 'कॉन्‍ट्रैक्ट सीएम' की संज्ञा मिली, जिसका दम राजीव गांधी ने महसूस किया। तत्कालीन सीएम एन.डी. तिवारी का इस्तीफ़ा इसी संकेत पर उजागर हुआ—और ऐसे यूपी के सीएम के रूप में वीर बहादुर सिंह ने 24 सितंबर 1985 को पद संभाला।

जन्म और राजनीतिक आरंभ

उनका जन्म 18 जनवरी 1935 को गोरखपुर के हरनाही गाँव में हुआ था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रियता दिखाने वाले वीर बहादुर ने छात्र राजनीति से शुरुआत की। युवा नेता ओम प्रकाश पांडे की मृत्यु के बाद पूर्वांचल में उन्होंने अहम भूमिका संभाली। वे पाँच बार विधायक चुने गए (1967, 1969, 1974, 1980, 1985) और 1988–1989 में राज्यसभा सदस्य भी रहे।

मुख्यमंत्री के रूप में सख्ती और कार्रवाई

सीएम नियुक्ति के पहले दिन ही उन्होंने मंत्रियों के समयपालन पर कड़ा आदेश जारी किया — सुबह 9:45 बजे तक कार्यालय में, और 10:15 पर सचिवालय के गेट बंद कर तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री को अंदर न घुसने देना। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में कोई समझौता नहीं सहा जाएगा। पहला निलंबन बाराबंकी के डीएम का हुआ, जहां बाढ़ राहत कार्य में लापरवाही उजागर हुई।

चुनौतियों का सामना करते हुए शासन

उनके कार्यकाल में यूपी ने कई संकट देखे—37 जिलों में दंगे, मेरठ में 181 लोगों की जान चली गई, अयोध्या विवाद उभरा, 16 लाख सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर गए, थोक संस्थानों में बंद, और एक विकराल सूखा भी आया। बावजूद इसके, उन्होंने गरीबों और युवाओं के लिए रोजगार एवं विकास को प्राथमिकता दी।

व्यक्तित्व: सरल लेकिन दांव-पेच में माहिर

वीर बहादुर की सादगी अच्‍छी तरह जानी जाती थी। उन्होंने मेकओवर किया तो शेरवानी पहनने लगे, लेकिन देसी अंदाज और सरल व्यवहार नहीं छोड़ा। वे कहते थे, “राजनीति में जन्म लेने वालों को विधायक बनने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए” — यह उनके सहज दृष्टिकोण का परिचायक था।

अपनी मौत और विरासत

1990 में पेरिस यात्रा के दौरान उनका निधन हुआ। इस अप्रत्याशित निधन ने लोगों को चौंका दिया—अंतिम सांस विदेश में ली जाने की बात को आज भी कई लोग संशय के साथ याद करते हैं। उनकी विरासत — सादगी और निर्णय के बीच एक राजनीतिक संतुलन — अब भी इतिहास में जीवित है।

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