नकुड़: सहारनपुर की धरती पर बदलती सियासत की कहानी

 

विधानसभा क्रमांक: 2
नाम: नकुड़
जिला: सहारनपुर
लोकसभा क्षेत्र: कैराना
विधानसभा का स्वरूप: सामान्य

सहारनपुर जिले के पश्चिमी हिस्से में स्थित नकुड़ सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र का नाम नहीं है। यह ऐसा इलाका है जहां कस्बाई संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खेती-किसानी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है।

नकुड़ की सियासत को समझना हो तो केवल यह देखना काफी नहीं कि किस चुनाव में कौन जीता। यहां की कहानी समझने के लिए गांवों की सामाजिक संरचना, खेती, स्थानीय व्यापार, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों को साथ देखना पड़ता है।

नाम से शुरू होती है कहानी

नकुड़ सहारनपुर क्षेत्र के पुराने कस्बों में गिना जाता है। सहारनपुर शहर से पश्चिम की ओर जाने पर यह इलाका धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस ग्रामीण भूगोल में प्रवेश करता है जहां खेती और गांवों की राजनीति का प्रभाव काफी मजबूत है।

यह क्षेत्र हरियाणा की सीमा के अपेक्षाकृत निकट होने के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश के व्यापक सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है।

नकुड़ की पहचान लंबे समय से कृषि प्रधान क्षेत्र की रही है। गेहूं, गन्ना और अन्य फसलों पर निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के राजनीतिक मुद्दों को प्रभावित करती रही है।

आज की सीट हमेशा ऐसी नहीं थी

यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने वाली है कि आज की नकुड़ विधानसभा संख्या 2 को पुराने चुनावों से सीधे जोड़ते समय सावधानी जरूरी है।

2008 के परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों की सीमाओं और क्रमांकों में बड़ा बदलाव हुआ। वर्तमान नकुड़ विधानसभा का स्वरूप इसी परिसीमन के बाद निर्धारित हुआ।

इसलिए 1950, 1960 या 1970 के दशक के चुनावी आंकड़ों को आज की नकुड़ सीट के साथ जोड़ने से पहले यह देखना आवश्यक होता है कि उस समय संबंधित गांव और क्षेत्र किस विधानसभा में आते थे।

यही कारण है कि नकुड़ का राजनीतिक इतिहास एक तरह से पुराने निर्वाचन क्षेत्रों की विरासत और नए परिसीमन की नई पहचान—दोनों को मिलाकर बनता है।

कांग्रेस के दौर से बहुदलीय राजनीति तक

स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय तक प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही। सहारनपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी कांग्रेस का मजबूत प्रभाव था।

लेकिन 1960 और 1970 के दशकों में भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव आए। कांग्रेस के सामने समाजवादी विचारधारा, किसान राजनीति और बाद में जनता पार्टी जैसे विकल्प मजबूत हुए।

1980 और 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव आया।

भाजपा, बसपा और समाजवादी पार्टी के उभार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।

नकुड़ भी इसी परिवर्तन का हिस्सा बना।

किसान राजनीति का असर

नकुड़ की राजनीति को समझने में किसान एक महत्वपूर्ण शब्द है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेती सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति का भी आधार रही है। जमीन, फसल का भाव, गन्ने का भुगतान, बिजली, सिंचाई और सड़क जैसे विषयों का सीधा संबंध ग्रामीण मतदाताओं से रहा है।

इसीलिए यहां चुनावी भाषणों में बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ बहुत स्थानीय सवाल भी सुनाई देते हैं।

किस गांव में सड़क चाहिए?

कहां बिजली की समस्या है?

गन्ने का भुगतान कब होगा?

किसान को फसल का उचित मूल्य मिलेगा या नहीं?

ऐसे सवाल नकुड़ की चुनावी राजनीति को जमीन से जोड़ते हैं।

2012: परिसीमन के बाद नया अध्याय

2008 के परिसीमन के बाद वर्तमान स्वरूप में नकुड़ विधानसभा की पहचान मजबूत हुई और 2012 का चुनाव इस नए परिसीमन के बाद के चुनावी इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

इसके बाद नकुड़ में भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित प्रमुख दलों के बीच कड़ा राजनीतिक मुकाबला देखने को मिला।

नकुड़ की राजनीति की खास बात यह रही कि यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता और स्थानीय सामाजिक समीकरण कई बार पार्टी की सामान्य लहर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

2017: भाजपा की बड़ी लहर

2017 का विधानसभा चुनाव पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐतिहासिक माना जाता है।

भाजपा ने राज्य में शानदार प्रदर्शन किया और नकुड़ में भी भाजपा के मुकेश चौधरी ने जीत दर्ज की।

यह परिणाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के बढ़ते प्रभाव का हिस्सा था।

2017 के बाद नकुड़ विधानसभा में भाजपा का प्रभाव पहले की तुलना में काफी स्पष्ट दिखाई देने लगा।

2022: कांटे का मुकाबला

2022 में उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुख्य मुकाबला था।

नकुड़ में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा। भाजपा के मुकेश चौधरी ने बहुत मामूली अंतर से जीत दर्ज की।

इस चुनाव ने यह दिखाया कि नकुड़ जैसी सीट पर राजनीतिक मुकाबला कितना करीबी हो सकता है।

यहां चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं था; इसके पीछे स्थानीय उम्मीदवारों की छवि, गांव-गांव का संगठन और अलग-अलग सामाजिक समूहों का समर्थन भी महत्वपूर्ण था।

नकुड़ की राजनीति में एक दिलचस्प बात

नकुड़ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन सीटों में रखा जा सकता है जहां कृषि और सामाजिक समीकरण चुनावी परिणाम पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

यहां ग्रामीण और कस्बाई मतदाताओं की प्राथमिकताएं पूरी तरह एक जैसी नहीं होतीं।

कस्बों में व्यापार, रोजगार और शहरी सुविधाएं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं, जबकि गांवों में खेती, सिंचाई, बिजली, सड़क और फसल का दाम प्रमुख मुद्दे बनते हैं।

इसी अंतर के कारण किसी उम्मीदवार के लिए पूरे विधानसभा क्षेत्र में समान समर्थन बनाना आसान नहीं होता।

नकुड़ और सामाजिक समीकरण

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है।

नकुड़ में भी अलग-अलग समुदायों की संख्या, उनका भौगोलिक वितरण और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व चुनाव को प्रभावित करते हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात है—सिर्फ जातीय गणित से चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना हमेशा सही नहीं होता।

उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय मुद्दे, पार्टी का संगठन और उस समय प्रदेश में चल रही राजनीतिक लहर भी परिणाम बदल सकती है।

नकुड़ इसका अच्छा उदाहरण है।

नकुड़ की सियासत और सहारनपुर

सहारनपुर जिले की राजनीति में नकुड़ का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शहर और पश्चिमी ग्रामीण क्षेत्र के बीच एक राजनीतिक कड़ी जैसा दिखाई देता है।

सहारनपुर शहर की राजनीति में जहां शहरी मुद्दे अधिक दिखाई देते हैं, वहीं नकुड़ में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान राजनीति का प्रभाव अधिक स्पष्ट है।

इसी कारण जिले की राजनीति को समझने के लिए नकुड़ को अलग से देखना उपयोगी है।

चुनावी कहानी का नया दौर

2022 के चुनाव के बाद नकुड़ में भाजपा के मुकेश चौधरी की जीत ने यह संकेत दिया कि सीट पर भाजपा का संगठन मजबूत है, लेकिन जीत का अंतर बेहद कम होने के कारण इसे सुरक्षित सीट कहना भी सही नहीं होगा।

नकुड़ ऐसी विधानसभा है जहां चुनाव के दौरान आखिरी समय तक मुकाबले की दिशा बदल सकती है।

यहां उम्मीदवार की पकड़ और बूथ स्तर का संगठन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

नकुड़ की पहचान — एक नजर में

विषय जानकारी
विधानसभा नंबर 2
विधानसभा का नाम नकुड़
जिला सहारनपुर
लोकसभा कैराना
सीट का प्रकार सामान्य
वर्तमान स्वरूप 2008 परिसीमन के बाद
2017 विजेता मुकेश चौधरी — भाजपा
2022 विजेता मुकेश चौधरी — भाजपा

नकुड़ को एक पंक्ति में

“नकुड़ की राजनीति खेत की मेड़ से शुरू होकर कस्बे की गलियों और चुनावी बूथ तक पहुंचती है।”

यही इसकी असली कहानी है—कृषि, स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक समीकरण और बदलती राजनीतिक लहरों का संगम।

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