PHE विभाग में RTI से क्यों घबरा रहे अधिकारी? भ्रष्टाचार खुलने का डर या जानकारी दबाने की कोशिश?
गंजबासौदा - विदिशा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग में सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर विभाग के जिम्मेदार अधिकारी सूचना देने में इतनी आनाकानी क्यों कर रहे हैं? क्या मांगी गई जानकारी से विभाग में हुई अनियमितताओं और संभावित भ्रष्टाचार की परतें खुलने का डर है या फिर अधिकारी केवल आवेदक को कार्यालयों के चक्कर लगवाकर समय बर्बाद कर रहे हैं?
मामले के अनुसार आवेदक ने PHE विभाग से विभिन्न बिंदुओं पर महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था। निर्धारित समय बीत जाने के बावजूद प्रथम लोक सूचना अधिकारी द्वारा पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। आवेदक ने पत्र के माध्यम से भी जानकारी देने का अनुरोध किया, लेकिन विभाग की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
हैरानी की बात यह है कि जब आवेदक ने प्रथम अपील की तो प्रथम अपीलीय अधिकारी की ओर से भी जानकारी को संक्षिप्त करने की बात कही गई। वहीं विभागीय अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों की कमी का हवाला देकर आवेदक पर अपने ही सवाल कम करने का दबाव बनाए जाने का आरोप है।
भ्रष्टाचार उजागर होने का डर तो नहीं?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विभाग को जानकारी देने में परेशानी क्या है? यदि विभाग में सभी कार्य नियमानुसार हुए हैं तो संबंधित दस्तावेज और रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में इतनी हिचकिचाहट क्यों? क्या जल जीवन मिशन सहित विभागीय कार्यों में हुए खर्च, निर्माण कार्यों, भुगतान, टेंडर और कार्यों की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारियां सामने आने से किसी की जवाबदेही तय हो सकती है? क्या इसी वजह से आवेदक को जानकारी कम करने के लिए कहा जा रहा है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब PHE विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए। फिलहाल भ्रष्टाचार या जानकारी दबाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
कर्मचारियों की कमी RTI से बचने का बहाना नहीं!
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 7(1) के तहत सामान्यतः 30 दिनों के भीतर जानकारी देना अनिवार्य है। धारा 7(9) सूचना देने के स्वरूप और संसाधनों के असंगत विचलन से संबंधित है, न कि जानकारी देने से पूरी तरह बचने का अधिकार। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कर्मचारियों की कमी बताकर आवेदक के सूचना मांगने के अधिकार को सीमित किया जा सकता है?
लापरवाही साबित हुई तो 25 हजार तक जुर्माना!
आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) के तहत बिना उचित कारण सूचना देने में देरी, गलत या भ्रामक जानकारी देने अथवा सूचना देने में बाधा डालने जैसे मामलों में राज्य सूचना आयोग संबंधित लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम ₹25,000 तक का व्यक्तिगत जुर्माना लगा सकता है। वहीं धारा 20(2) के तहत लगातार और बिना उचित कारण लापरवाही पाए जाने पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।
इसके अलावा धारा 7(6) के अनुसार निर्धारित समय-सीमा में जानकारी नहीं मिलने पर आवेदक को सूचना निःशुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
अब राज्य सूचना आयोग में पहुंचेगा मामला
महीनों की प्रतीक्षा, अधूरी जानकारी और अधिकारियों के कथित टालमटोल वाले रवैये से परेशान आवेदक अब मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में धारा 19(3) के तहत द्वितीय अपील प्रस्तुत करने की तैयारी में है। आवेदक आयोग से मांग करेगा कि सूचना उपलब्ध नहीं कराने के कारणों की जांच की जाए, मांगी गई संपूर्ण जानकारी दिलाई जाए तथा जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब PHE विभाग से जनता के सीधे सवाल:
1. आखिर निर्धारित समय-सीमा में जानकारी क्यों नहीं दी गई?
2. आवेदक को अपने सवाल कम करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
3. क्या विभागीय रिकॉर्ड में ऐसी कोई जानकारी है जिसे सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है?
4. क्या कर्मचारियों की कमी के नाम पर आरटीआई कानून की अनदेखी की जा सकती है?
5. यदि सब कुछ पारदर्शी है तो मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने में परेशानी क्यों?
अब देखना यह है कि PHE विभाग इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ देता है या फिर इस पूरे मामले का खुलासा कराने के लिए राज्य सूचना आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
रिपोर्टर - हेमंत आनंद

No Previous Comments found.