विनोद कुमार शुक्ल वर्तमान के मुंशी प्रेमचंद्र : एक श्रद्धांजली

BY-PRAKHAR SHUKLA 

विनोद कुमार शुक्ल साहित्य की  दुनिया में एक ऐसा नाम जिसके जाने ने सबको निस्तब्ध कर दिया , कई दिन से उनकी तबियत ठीक नहीं चल रही थी , मगर वो अस्पताल के बेड पर लेटे-लेटे लिखा करते थे , साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें मिला और उस दिन उन्होंने एक कविता पढ़ी- जागता हूँ तो सबकी नींद से/ सोता हूँ तो सबकी नींद में/ मैं अकेला नहीं/ मुझमें लोगों की भीड़ इकट्ठी है/ मुझे ढूँढो मत/ मैं सब लोग हो चुका हूँ/ मैं सबके मिल जाने के बाद/ आख़िर में मिलूँगा/ या नहीं मिल पाया तो/ मेरे बदले किसी से मिल लेना, लेकिन सच तो यही है कि किसी दूसरे से मिलना, दूसरे से मिलने की तरह होगा, विनोद कुमार शुक्ल से मिलने की तरह नहीं.

उनके जीवन में वो ठहराव , उनकी कविताओं में वो शांति का अनुभव शायद मेरे लिए वो बयां कर पाना बहुत मुश्किल है ,मैं जिनता जानता हूँ उनको ,खुद को उनकी जगह रख कर देखने की सिर्फ कल्पना मात्र ही कर सकता हूँ ,मेरे लिए अनुभव कर पाना उतना ही मुश्किल है जितना किसी अल्पज्ञ को बात समझाना, उनको श्रद्धांजलि में मैं क्या अर्पित करूँ , न उनके जैसा बनने की कोशिश कर पाउँगा , न उनके जैसी समझ विकसित कर पाउँगा , बस कर पाउँगा तो सिर्फ इतना कभी जब बहुत भर जाऊंगा और लिखने को दिल चाहेगा तो टूटी-फूटी कुछ शब्दों की माला बना लुंगा वही उनके चरणों में रख दूंगा, मैं नहीं करा पाउँगा एक सभा का आयोजन जिसमें साहित्यप्रेमियों को जाने की जल्दी रहे , मैं नहीं करा पाउँगा किसी भोज का आयोजन जिसमें लोग जाते ,समय कहे खाना बढि़या था  ......आपकी कविताएँ सुनाता हूँ जो मुझे है पसंद -

मैं अंतर्मुखी होकर कविता में अपने को एक वाक्य देता हूँ—

कि चलो निकलो।
इस वाक्य में बाहर देना भूल जाता हूँ।
इसलिए अपने अंदर और निकल जाता हूँ।
अंतर्मन के तालाब में
बहिर्मुख के प्रतिबिंब को
अंतर्मुख देखता हूँ।
बहिर्मुख की दाढ़ी बनाता हूँ।
बहिर्मुख को धोकर
अंतर्मुख साफ़ देखता हूँ।
तैयार होकर बाहर
परंतु अंतर्मुख के साथ निकल आता हूँ
खुली हवा में उसी से साँस लेता हूँ।

आँख बंद कर लेने से
अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती
जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण
जैसे दृष्टि की दूरी पर।
अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है
और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है
चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे
चंद्रमा और तारों के।
टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को
दृष्टि के भ्रम को
कि वह किस आले में रखा है
यदि वह रखा हुआ है।
कौन से अँधेरे सींके में
टँगा हुआ रखा है
कौन से नक्षत्र का अँधेरा।
आँख मूँदकर देखना
अंधे की तरह देखना नहीं है।
पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे
तरह-तरह की आवाज़ों के बीच
कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा
संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है
वह कुछ संसार स्पर्श करता है और
बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है

मुझे आपके घर आना है , उस झूले पर बैठ कर स्पर्श करना है ,उन जंजीरों को जो झूले की बेंत को एक सिरे से पकड़े हुए हैं, उन चारों जंजीरों को ,थोड़ा झूलना चाहता हूँ और उस हवा को महसूस करना चाहता हूँ ,जो आपके चेहरे को छुआ करती थी ,शायद वो आज भी आपके लिए इन्तेजार में बैठी होगी ,मैं उनके गले लगना चाहता हूँ उनके आलिंगन में शायद आपको ज्यादा महसूस कर सकता हूँ...मुझे लिखने की आदत डालनी है शायद आपकी कविताओं से वह आदत डल जाए...आदत को छोड़ना या अपनाना उतना कठिन भी नहीं है जितना उसे मान लिया जाता है, आपने अपनी आदत को बहुत सँवारा होगा , शायद उतना जितना कि एक माली सँवारता है अपने बगीचे को ,रखता है एक-एक फूल का ध्यान , करता है उनसे संवाद जैसे एक पिता अपने नन्हें पुत्र से करता है। क्योंकि शायद आप जानते हैं खुद से संवाद का महत्व , और उस संवाद को पन्ने पर उतार कर हमें भी बताया खुद से संवाद का तरीका । इसलिए संवाद करना है बहुत जरूरी खुद के साथ किसी एकांत में किसी शांत वातावरण में , जीवन के अनुभवों के साथ एक चीज समझ आयी , आपके हर सवाल का जवाब आपके पास है। और कोई जटिल सवाल यदि है तो किसी समझदार से संवाद करना सही साबित हो सकता है । फिल्हाल आपके बारे में जितना लिखा जाए , जितना कहा जाए उतना ही कम है इसलिए अपनी लेखनी को यहीं विराम देता हुँ। आप सदैव अपनी लेखनी से हमारे बीच में जिंदा रहेंगे।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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