बाप-बेटे की हत्या से दहला इलाका, फिर भी सियासत चुप: चौंका देगी 76 सीटों की कहानी
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच एक बार फिर हिंसा की घटनाएं चर्चा में हैं। मुर्शिदाबाद जिले के जाफराबाद इलाके में 11 अप्रैल 2025 को हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा। वक्फ संशोधन कानून के विरोध में निकली रैली अचानक उग्र हो गई और भीड़ ने एक हिंदू परिवार के दो सदस्यों—हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन—की हत्या कर दी। यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा को लेकर लोगों की सोच कितनी भिन्न है।
पीड़ित परिवार की स्थिति और स्थानीय माहौल
घटना के बाद परिवार की सदस्य पारुल दास आज भी सदमे में हैं। उनका कहना है कि उस दिन न तो पुलिस समय पर पहुंची और न ही बाद में उन्हें न्याय का भरोसा मिला। इलाके में अब बड़ी संख्या में BSF के जवान तैनात हैं और सैकड़ों CCTV कैमरे लगाए गए हैं, लेकिन डर का माहौल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। स्थानीय महिलाओं का कहना है कि सुरक्षा बढ़ने से हालात कुछ बेहतर जरूर हुए हैं, पर भरोसा अभी भी कमजोर है।
अलग-अलग इलाकों में अलग प्रतिक्रिया
जहां जाफराबाद में लोग इस घटना को चुनावी मुद्दा मान रहे हैं, वहीं मालदा जैसे जिलों में इसकी चर्चा सीमित है। वहां के कई लोगों का कहना है कि हिंसा पहले भी होती रही है, लेकिन चुनाव के समय यह हमेशा निर्णायक मुद्दा नहीं बनती। कुछ स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि हिंसा के दौरान पुलिस सक्रिय नहीं दिखी और हालात को काबू करने के लिए केंद्रीय बलों को आना पड़ा।
हिंसा का फैलाव और राजनीतिक समीकरण
मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम, नादिया, कूचबिहार और संदेशखाली जैसे जिलों में पिछले कुछ वर्षों में कई हिंसक घटनाएं सामने आई हैं। इन क्षेत्रों की कुल 76 विधानसभा सीटों में बहुमत तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पास है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी कई सीटों पर मजबूत स्थिति में है।
राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हैं। BJP का आरोप है कि राज्य सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में नाकाम रही है, जबकि TMC का कहना है कि विपक्ष जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाकर माहौल खराब करता है।
क्या हिंसा चुनावी मुद्दा बनती है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा कोई नई बात नहीं है। कई दशकों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन हर बार यह चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित नहीं करती। कई इलाकों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की पकड़ और संगठन की ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि हिंसा की घटनाएं गंभीर और चिंताजनक जरूर हैं, लेकिन उनका चुनावी प्रभाव हर क्षेत्र में समान नहीं है। कुछ जगहों पर यह बड़ा मुद्दा बनती है, तो कहीं यह चर्चा तक सीमित रह जाती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बंगाल की राजनीति में हिंसा एक स्थायी चुनौती है, लेकिन चुनावी नतीजों का अकेला निर्णायक कारक नहीं।


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