91 लाख वोटर आउट! क्या बंगाल में होने वाला है अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों के एलान के साथ ही राज्य की सियासत में चुनावी विस्फोट हो गया है। जी हां चुनाव आयोग ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने बंगाल से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। सोमवार की आधी रात को मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया संपन्न हुई और जो आंकड़े निकलकर सामने आए, वो चौंकाने वाले हैं। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। जी हां, यह कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक बड़ी आबादी है जिसे अब अपात्र घोषित कर दिया गया है। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से ठीक पहले इस महा-सफाई ने बंगाल की राजनीति में आग लगा दी है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर चुनाव आयोग पिछले साल से ही मिशन मोड में था। यह पूरी प्रक्रिया तीन बड़े और कड़े चरणों में पूरी की गई है। 

पहला चरण दिसंबर 2025 में: जब प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार हुआ, तभी आयोग ने करीब 58.2 लाख नामों पर कैंची चला दी थी।
दूसरा चरण फरवरी 2026 में: अंतिम सूची प्रकाशन के वक्त 5.46 लाख और संदिग्ध नाम हटाए गए।
तीसरा और निर्णायक चरण वर्तमान में: तकनीकी गड़बड़ियों के आधार पर लगभग 27.16 लाख और नाम हटाए गए।

आपको बता दें अब बंगाल में वोटरों की कुल संख्या में इस भारी कटौती के बाद सियासत के समीकरण पूरी तरह उलझ गए हैं।
इस बार चुनाव आयोग ने पारदर्शिता की सारी हदें तोड़ते हुए पहली बार जिलावार डेटा सार्वजनिक किया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा असर अल्पसंख्यक बहुल और सीमावर्ती जिलों में देखा गया है। जैसे...

मुर्शिदाबाद में रिकॉर्ड 4,55,137 नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं।
उत्तर 24 परगना में 3,25,666 वोटरों के नाम काटे गए हैं।
मालदा में 2,39,375 नामों को 'अपात्र' पाया गया है।

आयोग ने साफ किया है कि यह कार्रवाई 'न्यायिक अधिनिर्णय' के बाद की गई है, जहाँ न्यायिक अधिकारियों ने एक-एक मामले की बारीकी से जांच की और ई-हस्ताक्षर के जरिए अपनी मुहर लगाई है। वहीं इन आंकड़ों के सामने आते ही बंगाल में युद्ध छिड़ गया है। तृणमूल कांग्रेस ने इसे एक गहरी साजिश करार दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि जानबूझकर अल्पसंख्यक और सीमावर्ती इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है ताकि एक खास वर्ग के वोट बैंक को चुनाव से बाहर किया जा सके। ममता बनर्जी की पार्टी इसे लोकतंत्र की हत्या बता रही है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग का स्टैंड बिल्कुल साफ है। उनका कहना है कि यह वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण है। वर्षों से चल रहे फर्जी नामों, दोहरी प्रविष्टियों और घुसपैठियों के नामों को हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए अनिवार्य था। आयोग का तर्क है कि 60 लाख संदिग्धों में से 32.68 लाख पात्र लोगों के नाम दोबारा जोड़े भी गए हैं, जो साबित करता है कि प्रक्रिया निष्पक्ष है। आपको बता दें जिन 27 लाख लोगों के नाम अभी हटाए गए हैं, उनके लिए रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। आयोग ने साफ किया है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाने योग्य पाए गए हैं, वे इसके खिलाफ स्थापित 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों में अपनी गुहार लगा सकते हैं। अभी भी लगभग 22 हजार मामलों में अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर होना बाकी है, जिससे यह आंकड़ा थोड़ा और बढ़ सकता है।

देखा जाए तो 2026 का बंगाल चुनाव अब सिर्फ नारों और रैलियों का नहीं रह गया है, बल्कि यह शुद्ध डेटा की लड़ाई बन चुका है। 91 लाख नामों का कटना किसी भी पार्टी की जीत या हार का फैसला करने के लिए काफी है। ऐसे में सवाल है कि क्या यह कदम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगा या फिर यह एक नए राजनीतिक जनांदोलन को जन्म देगा? 23 अप्रैल को होने वाली पहले चरण की वोटिंग यह तय करेगी कि बंगाल की जनता ने इस महा-सफाई को किस रूप में लिया है। लेकिन एक बात तो तय है कि बंगाल की मतदाता सूची अब पहले जैसी नहीं रही, और इसका सीधा असर विधानसभा के नतीजों पर पड़ना तय है। नज़रें टिकी हैं अगले कुछ दिनों पर, क्योंकि अपीलीय न्यायाधिकरणों में अब दावों और आपत्तियों का मेला लगने वाला है! 

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