75 साल का रिकॉर्ड टूटा! 92% मतदान: बंगाल में 'खेला' हुआ या 'कमल' खिला?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण ने वो कर दिखाया है जो पिछले 75 सालों में नहीं हुआ। 152 सीटों पर जब ईवीएम में नेताओं की किस्मत कैद हुई, तो जो आंकड़ा निकलकर सामने आया उसने सबको चौंका दिया। और वो आंकड़ा है....92.88% मतदान! जी हां यह कोई मामूली संख्या नहीं है, यह बंगाल के मतदाताओं की उस गूंज की कहानी है जिसने लोकतंत्र के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने खुद इसे आजादी के बाद का सबसे ऊंचा ग्राफ बताकर सलाम किया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बंगाल में खेला हो चुका है या फिर इस बार कमल खिलने की तैयारी है? आइए जानते हैं।
आपको बता दें इस बार बंगाल की महिलाओं ने जिस तरह से मोर्चा संभाला है, वह देखने लायक है। पुरुषों के 90.92% के मुकाबले महिलाओं ने 92.69% वोटिंग कर यह साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में रहेगी, इसका फैसला घर की लक्ष्मी ही करेगी। दक्षिण दिनाजपुर जैसे जिलों में तो मतदान 94.4% तक पहुंच गया, यानी हर 100 में से 95 लोग वोट डालने निकले। यह जुनून बताता है कि बंगाल की जनता इस बार चुप बैठने के मूड में बिल्कुल नहीं है। वहीं इस बार वोटिंग बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा और चौंकाने वाला कारण है SIR। दरअसल, बंगाल की गलियों में यह चर्चा आग की तरह फैली कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं, उनकी नागरिकता पर संकट आ सकता है। वोट नहीं तो पहचान नहीं के इस डर ने उन प्रवासी मजदूरों को भी वापस बंगाल बुला लिया जो दूसरे राज्यों में काम कर रहे थे। लोग अपनी पहचान साबित करने के लिए मीलों सफर तय करके बूथ तक पहुंचे। यह डर और जागरूकता का ऐसा कॉकटेल बना कि वोटिंग 90% की सीमा को भी पार कर गई।
वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ शब्दों में कहा है कि यह रिकॉर्ड मतदान भय से भरोसे की ओर बढ़ता कदम है। बीजेपी का मानना है कि बढ़ा हुआ 10% मतदान सत्ता परिवर्तन की आहट है। सुवेंदु अधिकारी ने तो यहां तक दावा कर दिया है कि पहले चरण की 152 सीटों में से बीजेपी 125 सीटें जीत सकती है। बीजेपी के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है और उन्होंने घुसपैठ से लेकर विकास तक के मुद्दों पर ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की है। वहीं दूसरी तरफ, ममता बनर्जी और टीएमसी के लिए यह उनका सबसे मजबूत किला है। 2021 में इसी इलाके की 152 सीटों में से ममता ने 92 सीटें जीती थीं। टीएमसी का मानना है कि उनकी कल्याणकारी योजनाओं जैसे लक्ष्मी भंडार ने महिलाओं को इतना उत्साहित किया है कि उन्होंने बढ़-चढ़कर दीदी के पक्ष में मतदान किया है। टीएमसी उम्मीदवार अनूप मंडल का कहना है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने का श्रेय उनकी जमीन पर पकड़ को जाता है।
आपको बता दें इतिहास गवाह है कि जब-जब बंगाल में मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, तब-तब सत्ता की कुर्सी हिली है। 2011 में जब ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने लेफ्ट के शासन को उखाड़ फेंका था, तब वोटिंग में सिर्फ 3% की बढ़ोतरी हुई थी। आज तो मतदान में 10% का भारी उछाल आया है! वहीं 2011 में शून्य पर रहने वाली बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव तक इन सीटों पर 64 तक पहुंच चुकी है। उनका ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर जा रहा है। इतना ही नहीं मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में जहां 50-66% मुस्लिम आबादी है, वहां टीएमसी हमेशा से अजेय रही है। लेकिन इस बार बीजेपी ने यहां घुसपैठ का मुद्दा उठाकर और हुमायूं कबीर जैसी चुनौतियों ने इस खेल को और दिलचस्प बना दिया है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो बंगाल की इस महा वोटिंग ने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के गणित फेल कर दिये हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह 10% बढ़ा हुआ वोट ममता बनर्जी के प्रति अटूट विश्वास है या फिर सत्ता विरोधी लहर का वो ज्वालामुखी जो 4 मई को फटेगा? बीजेपी का बढ़ता ग्राफ और टीएमसी का अटूट किला, दोनों के बीच की ये टक्कर अब उस मोड़ पर है जहां एक-एक वोट की कीमत सोने से भी महंगी हो गई है। अब सभी को बस 4 मई का इंतजार है, जब ये सियासी बम फूटेगा।

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