ममता के 15 साल के अभेद्य दुर्ग का पतन, 207 सीटों के साथ भाजपा का राज्याभिषेक
4 मई 2026 की तारीख भारतीय राजनीति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज हो गई है। कोलकाता के कालीघाट से लेकर दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग तक, हवाओं का रुख बदला हुआ है। बंगाल, जिसे कभी वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब परिवर्तन की नहीं, बल्कि क्रांति की लहर चली है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता का बदलना नहीं है, बल्कि दो विचारधाराओं के उस भीषण युद्ध का परिणाम है जिसने भारतीय राजनीति का व्याकरण ही बदल कर रख दिया है। जी हां ममता बनर्जी के 15 साल के अभूतपूर्व शासन का अंत हो चुका है और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की धरती पर पहली बार भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस भगीरथी प्रयास की सिद्धि है, जिसकी शुरुआत उन्होंने बिहार की जीत के बाद 'गंगा को बंगाल की ओर मोड़ने' के संकल्प के साथ की थी। चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता ने 'सोनार बांग्ला' के सपने को मोदी की गारंटी से जोड़ दिया है।
आपको बता दें पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने वो कर दिखाया है जो कल तक नामुमकिन माना जाता था। बीजेपी ने 207 सीटों के प्रचंड आंकड़े के साथ बंगाल के सिंहासन पर कब्ज़ा कर लिया है! और सबसे बड़ी खबर ये है कि नंदीग्राम के नायक सुवेंदु अधिकारी ने एक बार फिर ममता बनर्जी को पटखनी दे दी है, जी हां ममता दीदी अपना चुनाव हार चुकी हैं। वहीं, 15 सालों से सत्ता के शिखर पर बैठी तृणमूल कांग्रेस महज़ 81 सीटों पर सिमट कर रह गई है! दरअसल, इस ऐतिहासिक जीत की पटकथा किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि बंगाल की गलियों, फुटबॉल के मैदानों और गांव के आंगनों में लिखी गई। भाजपा ने इस चुनाव को केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि एक सुपर-इंजीनियर्ड अभियान के रूप में लड़ा। पर्दे के पीछे सुनील बंसल ने संगठन को माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए बूथ स्तर पर एक सेना की तरह खड़ा किया।
भूपेंद्र यादव ने रणनीति को दिशा दी और बिप्लब कुमार देब ने पूर्वोत्तर के अपने अनुभवों से जमीनी तंत्र को धार दी। इनका तालमेल इतना सटीक था कि चुनाव 'मैक्रो' से 'माइक्रो' में बदल गया। इतना ही नहीं भाजपा ने बंगाल की रग-रग को समझा। राजनीति को मंच से उतारकर कमल मेला के जरिए उत्सव बना दिया गया, जहां स्थानीय संस्कृति और संगीत के बीच राजनीतिक संदेश परोसे गए। वहीं, बंगाल की जान फुटबॉल को युवाओं से जुड़ने का जरिया बनाया गया। हर मैदान पर हुए मैच ने भाजपा के लिए युवाओं के दिल में जगह बनाई।
वहीं फरवरी में परीक्षाओं के चलते जब लाउडस्पीकर शांत हुए, तब भाजपा ने अपना सबसे घातक हथियार आंगन बैठक निकाला। एक महीने में 1.65 लाख से अधिक घर-घर बैठकें की गईं। हर बूथ पर व्हाट्सएप ग्रुप बने और सीधा संवाद स्थापित हुआ। यहीं से भाजपा ने उस साइलेंट वोटर को साधा जिसने आज नतीजों में धमाका किया है। कहते हैं नारा जब भावना बन जाए, तो वह अजेय हो जाता है। 'हमें बचना है, इसलिए भाजपा चाहिए'...इस एक नारे ने सत्ता विरोधी लहर को घर-घर तक पहुंचा दिया। बच्चों की जुबान पर चढ़ा यह नारा ममता सरकार के खिलाफ एक जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया।
आपको बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी झोंक दी। उन्होंने बंगाल को 'बाहरी' और 'भीतरी' की बहस से निकालकर 'अंग-बंग-कलिंग' के गौरवशाली इतिहास से जोड़ा। ठंठनिया कालीबाड़ी में पूजा, मतुआ ठाकुर मंदिर में माथा टेकना और हुगली के नाविकों के साथ संवाद...मोदी ने खुद को बंगाल के एक अभिभावक के रूप में पेश किया। उन्होंने बंगाली में पत्र लिखकर और स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ उठाकर ममता बनर्जी के बाहरी वाले नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
वहीं भाजपा ने आरजी कार मेडिकल कॉलेज की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को चुनावी मैदान में उतारकर इसे सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि मां-बेटी के सम्मान की लड़ाई बना दिया। मोदी की रैलियों में इस मुद्दे ने महिलाओं को भाजपा की ओर मातृशक्ति के रूप में मोड़ दिया। ऐसे में आज के परिणाम चौंकाने वाले भी हैं और ऐतिहासिक भी। बंगाल के इतिहास में पहली बार किसी चुनाव में 92.47% मतदान दर्ज किया गया, जो भारत की आजादी के बाद एक रिकॉर्ड है। 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 193 सीटों के साथ साफ बहुमत हासिल कर चुकी है। यह 2021 की 77 सीटों से एक लंबी छलांग है। वहीं दूसरी तरफ 15 साल से सत्ता में काबिज ममता बनर्जी की पार्टी महज 81 सीटों पर सिमट कर रह गई है। सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोपों ने टीएमसी के दुर्ग को ढहा दिया।
जाहिर है बंगाल की चुनावी गंगा अब अपना मार्ग बदल चुकी है। यह जीत केवल सीटों की गिनती नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन की जीत है जिसमें बंगाल को दक्षिण-पूर्वी एशिया का गेटवे और 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का इंजन बनाना है। ममता बनर्जी की हार के साथ ही बंगाल में सिंडिकेट राज और कट मनी के युग का समापन माना जा रहा है।
4 मई की शाम बंगाल के आसमान में नए रंग लेकर आई है। अब बंगाल की राजनीति अस्मिता से ऊपर उठकर अपेक्षा और विकास के धरातल पर खड़ी है। 'सोनार बांग्ला' के निर्माण का अध्याय शुरू हो चुका है, और इसकी कमान अब भाजपा के हाथों में है। पूरब का भाग्य अब एक नई दिशा में मुड़ चुका है, जिसने पूरे देश को संदेश दिया है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज से बड़ा कोई किला नहीं होता।

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